“भगवान प्रेम से बंधते हैं, अहंकार से नहीं” — स्वामी सर्वानंद महाराज की अमृतवाणी से गुंजायमान हुआ श्री रामलीला मैदान

जमशेदपुर, 15 फरवरी : साकची स्थित श्री रामलीला मैदान में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन वृंदावन धाम से पधारे पूज्य संत स्वामी सर्वानंद जी महाराज की अमृतमयी वाणी ने श्रद्धालुओं को भक्ति रस में सराबोर कर दिया। श्री रामलीला उत्सव ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री राम-कृष्ण मित्र मंडल द्वारा आयोजित इस आध्यात्मिक महोत्सव में महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर विशेष उत्साह और श्रद्धा का वातावरण बना रहा।
कथा मंच से स्वामी सर्वानंद जी महाराज ने कहा, “भगवान शक्ति, वैभव या आडंबर से नहीं, बल्कि निष्कलुष प्रेम और पूर्ण समर्पण से प्रसन्न होते हैं।” उन्होंने श्रीकृष्ण जन्म उपरांत नंदोत्सव का भावपूर्ण वर्णन करते हुए कहा कि नंद बाबा के आंगन में जब आनंद का प्रकाश फैला, तब पूरा गोकुल झूम उठा। यह केवल एक बालक का जन्म नहीं, बल्कि धर्म और दिव्यता के अवतरण का प्रतीक था।
लीलाओं के माध्यम से आध्यात्मिक संदेश
पूतना उद्धार प्रसंग की व्याख्या करते हुए महाराज जी ने कहा कि भगवान शत्रु भाव से आई दैत्यनी को भी मातृत्व का स्थान देकर मोक्ष प्रदान करते हैं—यह दर्शाता है कि ईश्वर केवल भाव देखते हैं। त्रिणावर्त वध को उन्होंने अहंकार के विनाश का प्रतीक बताया और कहा कि जब तक मनुष्य अपने भीतर के अभिमान को समाप्त नहीं करता, तब तक उसे शांति नहीं मिल सकती।
नामकरण संस्कार के प्रसंग में ‘कृष्ण’ नाम की महिमा बताते हुए उन्होंने कहा कि कृष्ण वह हैं जो अपने आकर्षण से संपूर्ण सृष्टि को अपनी ओर खींच लेते हैं। माखनचोरी लीला को समझाते हुए उन्होंने कहा कि भगवान भक्तों के निर्मल हृदय रूपी माखन को चुराते हैं। गैयाबछिया चराना और रमणरेती की लीलाओं के माध्यम से सखा भाव, सरलता और सादगीपूर्ण जीवन का संदेश दिया गया।
ब्रह्मांड दर्शन लीला का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि यशोदा मैया को बालक कृष्ण के मुख में संपूर्ण सृष्टि का दर्शन होना इस सत्य का प्रमाण है कि परमात्मा सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान हैं। दामोदर लीला का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रेम का बंधन सबसे सशक्त होता है—उसी प्रेम ने अनंत को उखल से बांध दिया।
असुर वध और आंतरिक विकारों का संदेश
कथा के दौरान वकासुर, वत्सासुर, अघासुर, धेनुकासुर, प्रलंबासुर, केशी, शकटासुर और व्योमासुर जैसे असुरों के वध का आध्यात्मिक अर्थ स्पष्ट करते हुए महाराज जी ने कहा कि ये सभी हमारे भीतर के क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के प्रतीक हैं। इन विकारों का नाश ही सच्ची साधना है। कालियानाग मर्दन को उन्होंने जीवन से विषैले विचारों को दूर करने का संदेश बताया।
गोपियों के यमुना स्नान और कात्यायनी व्रत के प्रसंग में निष्काम भक्ति की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया। चीरहरण लीला को आत्मसमर्पण की चरम अवस्था बताते हुए उन्होंने कहा कि जब जीव अपने अहंकार का आवरण त्याग देता है, तभी उसे परमात्मा की कृपा प्राप्त होती है। गोवर्धन पूजा प्रसंग में इंद्र के अभिमान भंजन की कथा के माध्यम से प्रकृति संरक्षण, सामूहिकता और विनम्रता का संदेश दिया गया।
महाशिवरात्रि पर शिव महिमा का गुणगान
महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर स्वामी सर्वानंद जी महाराज ने भगवान शिव की महिमा का गुणगान करते हुए कहा कि शिव और कृष्ण एक ही परम सत्य के दो स्वरूप हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं को महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं देते हुए जप, तप, उपवास और रुद्राभिषेक के महत्व पर प्रकाश डाला तथा जीवन में संयम, सेवा और साधना अपनाने का आह्वान किया।
कथा के समापन पर सामूहिक आरती और प्रसाद वितरण किया गया। आयोजन समिति ने बताया कि आगामी दिनों में भी श्रीमद्भागवत के अन्य प्रसंगों का विस्तृत वर्णन किया जाएगा तथा अंतिम दिन भव्य हवन और भंडारे का आयोजन होगा।
आज की कथा के यजमान के रूप में भारत भूषण त्रिवेदी, द्वारिका प्रसाद एवं राजेश अग्रवाल ने परिवार सहित पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
श्री रामलीला मैदान में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ इस बात का प्रमाण रही कि जब संत वाणी से भक्ति की गंगा बहती है, तो जन-जन का हृदय श्रद्धा से आप्लावित हो उठता है।



