जनप्रतिनिधियों के कार्रवाई का दायरा – जिला परिषद उपाध्यक्ष की पहल से उठे सवाल

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जनप्रतिनिधियों के कार्रवाई का दायरा – जिला परिषद उपाध्यक्ष की पहल से उठे सवाल

सरायकेला-खरसावां, 13 जुलाई : क्या किसी जनप्रतिनिधि को अवैध कारोबार पर सीधे तौर पर कार्रवाई करने का अधिकार है? यह सवाल इन दिनों सरायकेला-खरसावां जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है। चर्चा की वजह बनी है जिला परिषद उपाध्यक्ष मधुश्री महतो की वह पहल, जब उन्होंने बीते शुक्रवार की रात नीमडीह थाना क्षेत्र अंतर्गत सिरूम चौक पर बालू लदे दो ओवरलोडेड हाइवा ट्रकों को रोक दिया।

मधुश्री महतो ने दावा किया कि उक्त दोनों हाइवा अवैध तरीके से ओवरलोड बालू लादकर ले जा रहे थे। उन्होंने वाहनों को रोकने के साथ ही तत्काल इसकी सूचना खनन विभाग, कुकडू अंचलाधिकारी और नीमडीह पुलिस को दी। सूचना मिलने पर शनिवार सुबह खनन विभाग के निरीक्षक, अंचलाधिकारी तथा पुलिस ने मौके पर पहुंचकर दोनों वाहनों की जांच की और बालू लदे दोनों हाइवा को जप्त कर थाना को सुपुर्द कर दिया।

प्रशासनिक निष्क्रियता के विरोध में ‘जन पहल’

इस घटना को लेकर जिला परिषद उपाध्यक्ष मधुश्री महतो का कहना है कि नीमडीह व तिरुलडीह क्षेत्र में लंबे समय से अवैध बालू खनन और उसके ट्रांसपोर्ट को लेकर उन्होंने कोल्हान आयुक्त, उपायुक्त, पुलिस अधीक्षक तथा खनन विभाग को कई बार लिखित शिकायत दी है। उन्होंने अपने दावे के समर्थन में कई फोटो और वीडियो भी सौंपे, परन्तु कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

 

मधुश्री महतो ने स्पष्ट किया कि – “मैंने यह कदम किसी विभाग की भूमिका में हस्तक्षेप करने के लिए नहीं उठाया, बल्कि इसलिए कि उच्च अधिकारियों का ध्यान गंभीर समस्या की ओर जाए। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाया गया, तो यह अवैध कारोबार सामाजिक, पर्यावरणीय और प्रशासनिक रूप से नुकसानदेह होगा,”

उठते सवाल : जनप्रतिनिधि बनाम कार्यपालिका

हालांकि, इस पहल को लेकर कई पूर्व जनप्रतिनिधि और ग्रामीणों ने सवाल उठाए हैं। उनका मानना है कि जनप्रतिनिधियों का मुख्य कार्य नीति निर्धारण, निगरानी और जनहित में आवाज उठाना है, न कि सीधे तौर पर सड़कों पर उतरकर वाहनों की जांच करना।

एक पूर्व जिला परिषद ने कहा, “यदि हर जनप्रतिनिधि इस तरह वाहनों को रोकने लगे तो फिर प्रशासनिक अमले का क्या काम रह जाएगा? इससे अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।”

कानूनी पक्ष : अधिकारों की सीमा

कानून विशेषज्ञों का कहना है कि कोई भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि प्रशासनिक अथवा विधिक कार्रवाई करने का अधिकार नहीं रखता, जब तक कि वह संबंधित विभाग की आधिकारिक प्रक्रिया का हिस्सा न बने।

हालांकि, किसी भी नागरिक को संदेहास्पद गतिविधि की सूचना प्रशासन को देने का अधिकार है। जिला परिषद उपाध्यक्ष का यह कदम सूचना देने से आगे बढ़ते हुए कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है, जो संवैधानिक दायरे में एक ‘ग्रे जोन’ की तरह है।

यह घटना कई स्तरों पर बहस को जन्म देती है—एक ओर जनप्रतिनिधि की संवेदनशीलता और सक्रियता, तो दूसरी ओर प्रशासनिक व्यवस्था की निष्क्रियता।

जरूरत इस बात की है कि जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच संवाद और समन्वय को मजबूत किया जाए। अगर प्रशासन समय रहते कार्रवाई करे, तो किसी जनप्रतिनिधि को सड़क पर उतरने की जरूरत ही न पड़े। वहीं, जनप्रतिनिधियों को भी अपने संवैधानिक दायरे में रहते हुए जनता के मुद्दों को उठाना चाहिए।

इस मामले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अवैध खनन जैसी समस्याओं से निपटने के लिए केवल प्रशासनिक या केवल जन प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है, बल्कि एक सशक्त सहयोग और जवाबदेही की आवश्यकता है।

 

 

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