संरक्षण की चादर ओढ़कर चलाया जा रहा है बालू का अवैध कारोबार, प्रति ट्रिप 8 हजार की वसूली

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संरक्षण की चादर ओढ़कर चलाया जा रहा है बालू का अवैध कारोबार, प्रति ट्रिप 8 हजार की वसूली

ईचागढ़, 01 सितंबर : सरायकेला-खरसावां जिले का ईचागढ़ थाना क्षेत्र अवैध बालू कारोबार का गढ़ बन चुका है। यहाँ नियम और कानून की जगह सिर्फ वसूली का राज चलता है। हाइवा वाहन मालिकों को प्रत्येक ट्रिप पर 8 हजार रुपये बतौर नजराना चुकाना पड़ता है। कुछ महीने पहले तक यह रेट 6 हजार रुपये था, लेकिन अब इसे 8 हजार कर दिया गया है।

हैरानी की बात यह है कि यह वसूली किसी बाहरी माफिया या दबंग द्वारा नहीं, बल्कि एक सरकारी कार्यालय के प्रभारी द्वारा की जाती है। अब वे खुद अवैध कारोबार के सबसे बड़े ठेकेदार बन बैठे हैं। क्षेत्र में चलने वाले बालू गाड़ियों की गिनती करने के लिए जगह-जगह उनके द्वारा लोग तैनात किया गया है।

मानभूम अपडेट्स की खबर का असर, पर सिर्फ दिखावा

मानभूम अपडेट्स ने 30 अगस्त को ईचागढ़ में जारी अवैध बालू खनन और परिवहन पर विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी। खबर छपते ही 31 अगस्त से अवैध कारोबार अचानक ठप कर दिया गया, लेकिन यह ठप होना सिर्फ दिखावा है। सूत्रों की माने तो, वसूली करने वाले सरदार के आदेश पर सिर्फ चार दिन के लिए कारोबार रोका गया है। इसके बाद फिर से वही खेल शुरू होगा।

एक बालू कारोबारी ने खुलासा किया कि काम रोकने का आदेश खुद वसूली प्रभारी ने दिया है। वसूली प्रभारी कहते हैं उन्हें एक बड़े साहब का संरक्षण प्राप्त है। उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है, एेसा मानकर वे खुलेआम वसूली करते हैं।

प्रशासन और कानून व्यवस्था पर सीधा तमाचा

इतना ही नहीं, बालू कारोबारियों का कहना है कि इसमें कोई दो राय नहीं है कि वसूली प्रभारी इस वसूली का हिस्सा हर महीने उनके बड़े साहब तक भी पहुंचाता है। यानी पूरे सिस्टम में ऊपर से नीचे तक मिलीभगत है। यह स्थिति प्रशासन और कानून व्यवस्था पर सीधा तमाचा है। जब खुद जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग माफिया बन जाएं, तो आम जनता न्याय और पारदर्शिता की उम्मीद आखिर किससे करे?

ईचागढ़ का यह वसूली तंत्र साफ दिखाता है कि अवैध कारोबार सिर्फ स्थानीय स्तर पर नहीं, बल्कि संरक्षण की चादर ओढ़कर चलाया जा रहा है। ग्रामीणों में गुस्सा है, लेकिन वे डर के कारण खुलकर बोल नहीं पा रहे।

किससे करें न्याय की उम्मीद

अवैध बालू के कारोबार को लेकर जनाक्रोश जागा है, पर लोग मजबूर हैं। सभी को मालूम है कि इस गोरखधंधे के पीछे कौन है और किसका संरक्षण प्राप्त है, लेकिन खुलकर विरोध करने का मतलब है सीधे माफियाओं और उनके आकाओं से टकराना है। यह सिर्फ ईचागढ़ की कहानी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पोल खोलता है। लोगों का मानना है कि जब जिम्मेदार सरकारी पदाधिकारी ही अवैध कारोबार के हिस्सेदार हों तो कानून का राज कैसा और न्याय की उम्मीद किससे ?

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