“परंपरा से प्रयोगशाला तक: झारखंड में राष्ट्रपति मुर्मू ने आदिवासी अस्मिता और आधुनिक भारत को एक मंच पर जोड़ा”

जमशेदपुर/आदित्यपुर, 29 दिसंबर : झारखंड की धरती पर सोमवार का दिन केवल एक संवैधानिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भाषा, संस्कृति और आधुनिक शिक्षा के संगम के रूप में दर्ज हो गया। भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के झारखंड दौरे ने यह संदेश साफ कर दिया कि देश की प्रगति की जड़ें अपनी मूल संस्कृति और भाषायी पहचान में ही सबसे मजबूत होती हैं।
राष्ट्रपति मुर्मू सोमवार को करनडीह, जमशेदपुर में संथाली भाषा की ओल चिकी लिपि के शताब्दी समारोह में शामिल हुईं। यह आयोजन सिर्फ एक ऐतिहासिक उपलब्धि का उत्सव नहीं था, बल्कि आदिवासी समाज की उस पहचान का सम्मान था, जिसे दशकों तक हाशिये पर रखा गया। जब राष्ट्रपति ने स्वयं संथाली भाषा में ‘जाहेर आयो’ गीत गाया, तो पूरा पंडाल तालियों और भावनाओं से गूंज उठा। यह क्षण बताता है कि देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद आदिवासी संस्कृति को केवल देख नहीं रहा, बल्कि उसे जी भी रहा है।
इसके बाद राष्ट्रपति का कार्यक्रम एनआईटी जमशेदपुर (आदित्यपुर) के दीक्षांत समारोह में रहा, जहां उन्होंने युवा इंजीनियरों और शोधार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि तकनीकी विकास तभी सार्थक है जब वह समाज के अंतिम व्यक्ति को सशक्त बनाए। राष्ट्रपति का यह संदेश विशेष रूप से झारखंड जैसे राज्य के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां प्राकृतिक संसाधनों के साथ-साथ बौद्धिक क्षमता की भी अपार संभावनाएं हैं।
राष्ट्रपति के दौरे को लेकर रांची से जमशेदपुर तक सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। मार्गों पर विशेष निगरानी, यातायात नियंत्रण और प्रशासनिक तैयारियों ने यह स्पष्ट किया कि राज्य सरकार इस दौरे को ऐतिहासिक बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती थी। स्थानीय आदिवासी समाज और सामाजिक संगठनों में राष्ट्रपति के आगमन को लेकर खासा उत्साह देखने को मिला। पारंपरिक वेशभूषा, लोकनृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से लोगों ने अपनी संस्कृति का जीवंत परिचय दिया।
नया एंगल यही है कि राष्ट्रपति मुर्मू का यह दौरा केवल कार्यक्रमों की सूची तक सीमित नहीं रहा। राष्ट्रपति का यह दौरा एक स्पष्ट संदेश बनकर उभरा— देश की प्रगति का रास्ता तभी मजबूत होगा, जब आदिवासी भाषाओं, संस्कृति और ज्ञान परंपराओं को राष्ट्र निर्माण के केंद्र में स्थान मिलेगा।
आज झारखंड में परंपरा और तकनीक, जंगल और संस्थान, गीत और विज्ञान—सब एक साथ खड़े नजर आए। राष्ट्रपति मुर्मू का यह दौरा आने वाले समय में झारखंड की पहचान को केवल खनिज राज्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और बौद्धिक शक्ति केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है।



