दलमा में 12 करोड़ की लागत से 30 ईको कॉटेज का शिलान्यास, जंगल सफारी सेवा शुरू — ग्रामसभा की अनदेखी पर उठे सवाल

चांडिल, 07 फरवरी: दलमा वन्यप्राणी आश्रयणी में शनिवार को राज्य के पर्यटन, कला-संस्कृति, नगर विकास एवं आवास तथा उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने 30 ईको कॉटेज निर्माण परियोजना का विधिवत शिलान्यास किया। इस अवसर पर ईचागढ़ विधायक सविता महतो एवं घाटशिला विधायक सोमेश सोरेन भी प्रमुख रूप से मौजूद रहे। कार्यक्रम के दौरान पांच नए जंगल सफारी वाहनों को हरी झंडी दिखाकर सेवा का शुभारंभ किया गया।
जानकारी के अनुसार करीब 12 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली 30 ईको कॉटेज परियोजना का उद्देश्य दलमा आने वाले पर्यटकों को अभ्यारण्य के समीप ठहरने की बेहतर सुविधा उपलब्ध कराना है। मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने कहा कि इस पहल से न केवल पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार पर्यटन विकास को स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ने के लिए प्रतिबद्ध है।
विधायक सविता महतो ने इसे क्षेत्रीय पर्यटन के लिए सकारात्मक कदम बताते हुए कहा कि ईको कॉटेज और जंगल सफारी से दलमा की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत होगी। विधायक सोमेश सोरेन ने कहा कि यह परियोजना क्षेत्र के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है, जिससे युवाओं को स्वरोजगार के अवसर मिलेंगे।
सफारी वाहनों के शुभारंभ के बाद मंत्री, विधायक एवं वन विभाग के अधिकारियों ने स्वयं जंगल सफारी कर भ्रमण किया और दलमा के प्राकृतिक सौंदर्य का अवलोकन किया। कार्यक्रम में डीएफओ सबा आलम, रेंजर दिग्विजय सिंह, शशि प्रकाश रंजन, दिनेश चंद्रा सहित झामुमो के कई नेता एवं स्थानीय ग्रामीण उपस्थित थे।
ग्रामसभा की सहमति पर उठे गंभीर प्रश्न
परियोजना की घोषणा और शिलान्यास के साथ ही इसे लेकर विवाद भी खड़ा हो गया है। दलमा क्षेत्र ग्राम सभा सुरक्षा मंच, कोल्हान के केंद्रीय सचिव सुकलाल पहाड़िया ने इस निर्माण कार्य पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि दलमा क्षेत्र पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जहाँ किसी भी विकासात्मक परियोजना से पूर्व संबंधित ग्रामसभा की सहमति अनिवार्य मानी जाती है।
उन्होंने आरोप लगाया कि ग्रामसभा से पूर्वानुमति लिए बिना ईको कॉटेज निर्माण की प्रक्रिया शुरू करना न केवल संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी है, बल्कि पेसा (PESA) कानून की भावना के भी प्रतिकूल है। मंच का कहना है कि पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों में स्थानीय आदिवासी समुदायों को भूमि, जल, जंगल पर परंपरागत अधिकार प्राप्त हैं और किसी भी परियोजना में उनकी भागीदारी व सहमति सर्वोपरि होनी चाहिए।
सुकलाल पहाड़िया ने स्पष्ट किया कि मंच विकास विरोधी नहीं है, लेकिन कानून और ग्रामसभा की अवहेलना कर किए जा रहे कार्यों का विरोध किया जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि वन विभाग ने इस विषय पर पुनर्विचार नहीं किया, तो मंच चरणबद्ध आंदोलन करेगा और आवश्यकता पड़ने पर उच्च न्यायालय की शरण भी लेगा।
वन विभाग की भूमिका पर सवाल
स्थानीय संगठनों का आरोप है कि दलमा जैसे संवेदनशील वन्य क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य शुरू करने से पहले न तो ग्रामसभा की विधिवत बैठक कराई गई और न ही सार्वजनिक स्तर पर विस्तृत जानकारी साझा की गई। आलोचकों का कहना है कि यदि पाँचवीं अनुसूची और पेसा कानून के प्रावधानों का पालन नहीं हुआ है, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि कानूनी प्रक्रिया की गंभीर उपेक्षा मानी जाएगी।
हालांकि वन विभाग की ओर से इस संबंध में आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है, लेकिन बढ़ते विरोध के बीच यह मुद्दा अब विकास बनाम अधिकार की बहस का रूप लेता दिख रहा है।
एक ओर सरकार पर्यटन और रोजगार सृजन की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय संगठनों का सवाल है कि क्या विकास की इस परिकल्पना में ग्रामसभा की संवैधानिक भूमिका को दरकिनार किया जा सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विभाग इस आपत्ति पर क्या रुख अपनाता है और क्या परियोजना ग्रामसभा की सहमति प्रक्रिया से होकर आगे बढ़ेगी।



