सफलता की मिसाल : सीतारामपुर जलाशय में पहली बार वैज्ञानिक केज पद्धति से मछली पालन, जनजातीय समुदाय को मिला आजीविका का नया सहारा

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सफलता की मिसाल : सीतारामपुर जलाशय में पहली बार वैज्ञानिक केज पद्धति से मछली पालन, जनजातीय समुदाय को मिला आजीविका का नया सहारा

गम्हरिया/ सरायकेला-खरसावां | विशेष रिपोर्ट

सफलता की जब कोई नई इबारत लिखी जाती है, तो वह केवल आंकड़ों की कहानी नहीं होती, बल्कि उसमें छिपे होते हैं संघर्ष, नवाचार और बदलाव के सूत्र। जिले के गम्हरिया अंचल स्थित सीतारामपुर जलाशय में ऐसी ही एक इबारत रची जा रही है – जहां पारंपरिक जीवनशैली में रचे-बसे जनजातीय समुदाय के लिए आधुनिक विज्ञान और तकनीक ने आजीविका का नया द्वार खोला है।

विस्थापन से पुनरुत्थान तक का सफर

करीब 70 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह जलाशय 1963 से सिंचाई के उद्देश्य से उपयोग में लाया जा रहा है। लेकिन इसके निर्माण के दौरान आसपास के 10 गांवों के लगभग 1300 परिवार विस्थापित हो गए थे, जिनकी जीविका मुख्य रूप से खेती पर आधारित थी। वर्षों तक यह समुदाय आजीविका के लिए जूझता रहा। वर्ष 2007 से मत्स्य पालन के माध्यम से इन्हें पुनः मुख्यधारा में जोड़ने का प्रयास शुरू हुआ, लेकिन उत्पादन परंपरागत तरीकों पर ही निर्भर रहा।

धरती आबा योजना बनी बदलाव की धुरी

वर्ष 2024-25 में “धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान योजना” के तहत पहली बार जलाशय में वैज्ञानिक केज पद्धति से मछली पालन की शुरुआत की गई। यह पहल केवल एक योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण आजीविका, तकनीकी समावेशन और समुदाय सशक्तिकरण का सजीव उदाहरण बन गई है।

इस योजना के तहत 8 लाभुकों को कुल 32 फ्लोटिंग केज यूनिट उपलब्ध कराए गए। प्रत्येक यूनिट में 4 घेरे हैं, जो मजबूत जीआई पाइप और विशेष जाल से बनाए गए हैं ताकि कछुए या अन्य जलीय जीव क्षति न पहुंचा सकें। इन केजों में चयनित मछली अंगुलिकाएं डाली जाती हैं, जिन्हें संतुलित आहार और वैज्ञानिक देखभाल के साथ पाला जाता है।

प्रभावशाली बदलाव: उत्पादन में जबरदस्त वृद्धि

जहां पहले केवल पारंपरिक शिकारमाही और रिवराइन फार्मिंग होती थी, अब केज कल्चर तकनीक के कारण मछली उत्पादन में 8 से 10 गुना तक की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। यह तकनीक मछलियों की जीवन प्रत्याशा और गुणवत्ता दोनों को बेहतर बनाती है, जिससे बाजार में उनकी मांग भी बढ़ी है।

संरचना और सुविधाएं: आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम

योजना के तहत लाभुकों को 90 प्रतिशत तक की अनुदान सहायता दी गई है (60% केंद्र और 30% राज्य अंश)। साथ ही, झारखंड स्टेट को-ऑपरेटिव फिश फेडरेशन लिमिटेड (झास्कोफिश) के सहयोग से समिति को विपणन सुविधा, दुपहिया-तीनपहिया वाहन, आइस बॉक्स और कार्यालय शेड जैसे उपकरण उपलब्ध कराए गए हैं, जिससे मत्स्य परिवहन और बिक्री अब सुगम हो गई है।

जनजातीय समुदाय को नई पहचान

सीतारामपुर मत्स्यजीवी सहयोग समिति की भूमिका इस पूरी प्रक्रिया में केंद्रीय रही है। इस समिति ने न केवल तकनीकी प्रशिक्षण और सामूहिक भागीदारी को प्रोत्साहित किया, बल्कि लाभुकों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का मार्ग भी प्रशस्त किया। महिलाओं की भी भागीदारी बढ़ी है, जो कि सामाजिक दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण बदलाव है।

भविष्य की राह: संभावनाओं का विस्तार

इस सफलता ने यह संकेत दे दिया है कि जलाशयों का वैज्ञानिक और सतत उपयोग न केवल मछली उत्पादन को बढ़ा सकता है, बल्कि जल पर्यटन, बत्तख पालन, मत्स्य प्रसंस्करण जैसे सहायक उद्योगों के विकास की संभावनाएं भी खोलता है। यह पहल आने वाले समय में आसपास के अन्य जलाशयों के लिए भी एक मॉडल परियोजना के रूप में स्थापित हो सकती है।

सफलता की कहानी, सीखने योग्य अध्याय

सीतारामपुर जलाशय में केज कल्चर तकनीक से मछली पालन की यह शुरुआत एक स्थानीय पहल से कहीं अधिक है। यह एक प्रगतिशील विचार है, जिसमें प्रकृति, तकनीक और समुदाय – तीनों का सामंजस्य दिखता है। जनजातीय समुदाय को सम्मानजनक आजीविका प्रदान कर यह पहल उन्हें केवल आर्थिक रूप से नहीं, सामाजिक रूप से भी सशक्त बना रही है।

यह सफलता न केवल राज्य के अन्य अंचलों को प्रेरणा दे सकती है, बल्कि यह देश भर के उन क्षेत्रों के लिए भी मार्गदर्शक बन सकती है, जो जल संसाधनों का सतत और वैज्ञानिक उपयोग कर जनजातीय एवं ग्रामीण विकास का नया अध्याय लिखना चाहते हैं।

ManbhumUpdates.com | संवाददाता

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