कर्म प्रधान और प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है करम पर्व, पूजा आज

मानभूम अपडेट्स, डेस्क : प्रकृति उपासना का पर्व करम भादों माह के शुक्ल पक्ष को मनाया जाता है जब वर्षा और शरद ऋतु का मिलन होता है और प्रकृति के चारों ओर हरियाली छाई रहती है। करम पर्व झारखंड समाज का लगभग हर वर्ग धूमधाम के साथ मनाता है। भादो महीना शुरू होते ही युवतियां करम पर्व की तैयारियां शुरू कर देती हैं। करम पर्व में लोग पूजा-अर्चन कर प्रकृति से अच्छी फसल के साथ पूरे परिवार के सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं। चांडिल अनुमंडल क्षेत्र के अलावा पूरे राज्य में बुधवार को प्रकृति पर्व करम मनाया जा रहा है। कुछ स्थानों में गुरुवार को भी करम पूजा किया जाएगा। पर्व को लेकर चारों ओर उल्लास का माहौल है। करम पूजा के बाद करम अखाड़ों में रात को जगारण होता है, जहां लोग पारंपरिक करम गीतों पर करम नृत्य करते हैं।

बहने रखती है उपवास
करम पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम पर भी आधारित है। इस पर्व में बहने अपने भाईयों के लिए उपवास रखती हैं। पूजा के एक दिन पहले उपवास रखने वाली बहने नदी और अन्य जलाशयों में बनाए गए करम घाटों में स्नान करने जाती है और घाट से नई टोकरी में बालू भरकर लाती है। इसे करम जावा कहते हैं। टोकरी में बालू लाने के बाद उसे घर के आंगन और स्थापित करम अखाड़ों में रखती हैं। टोकरी में लाए गए बालू में धान, गेंहू, चना, मटर, मकई, जौ, बाजरा, उरद, कुलथी आदि नौ प्रकार के अन्न के बीज बोए जाते हैं। अन्न के दानों से सजाए गए जावा को हल्दी पानी से सिंचा जाता है। बहने करम जावा जगाती हैं, इसके लिए गीत व नृत्य करती हैं। जावा के पास खीरा, गुड़, आरवा चावल के साथ दीप जलाकर रखा जाता है।

भाई लाते हैं करम डाली
करम पर्व के लिए भाई पवित्र वस्त्र धारण कर जंगल से करम डाली लाते हैं। करम डाली को आंगन या आखड़ा में स्थापित किया जाता है। कई स्थानों में घर के आंगन और आखड़ा में करम का पेड़ भी, जहां लोग पूजा करते हैं। करम पूजा अलग-अलग स्थानों मेें अलग-अलग माध्यम से की जाती है। कई स्थानों में पूजा पंडित, पाहन और अपने-अपने समाज के पुजारियों से कराया जाता है, तो कई स्थानों में बहने सामूहिक रूप से स्वयं पूजा करती हैं। इस दौरान करम पूजा पर आधारित कथा भी सुनाया जाता है। सभी कथा व कहानियां कर्म प्रधानता और प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है। पूजा-अर्चना के दूसरे दिन खेतों में करम डाली गाड़ने की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद घाटों में करम राजा का विसर्जन कर दिया जाता है।



