स्वर्णरेखा परियोजना में 20 साल से जमकर बैठा भ्रष्टाचार का ‘टंकक’! मुख्यमंत्री को सौंपा गया मानवाधिकार संगठन का विस्फोटक ज्ञापन

रांची/जमशेदपुर, विशेष संवाददाता,31 जुलाई : झारखंड ह्यूमन राइट्स एसोसिएशन ने स्वर्णरेखा बहुद्देशीय परियोजना में लंबे समय से जारी कथित भ्रष्टाचार, दलाली और पद के दुरुपयोग को लेकर झारखंड के मुख्यमंत्री को एक कड़ा और गंभीर आरोपों से भरा ज्ञापन सौंपा है। एसोसिएशन के अध्यक्ष दिनेश कुमार शर्मा उर्फ कीनू द्वारा प्रस्तुत इस ज्ञापन में परियोजना के टंकक प्रोसेनजीत घोष की कार्यशैली पर तीखी आलोचना की गई है।
ज्ञापन में बताया गया है कि प्रोसेनजीत घोष पिछले 20 वर्षों से नियमों को ताक पर रखकर उसी कार्यालय में प्रतिनियुक्ति पर जमे हुए हैं, जबकि सरकारी सेवा शर्तों के अनुसार किसी भी कर्मी की एक ही कार्यालय में अधिकतम सेवा अवधि 3 वर्ष निर्धारित है। यह लंबे समय से जारी प्रशासनिक ढिलाई और राजनीतिक संरक्षण का जीता-जागता उदाहरण माना जा रहा है।
ज्ञापन में सबसे सनसनीखेज आरोप यह है कि प्रोसेनजीत घोष ने ईचागढ़ की विधायक सविता महतो के लैटर पैड का कथित दुरुपयोग करते हुए स्वयं की प्रशंसा में पत्र तैयार कराया, जिसे परियोजना के प्रशासक तक भेजा गया। यही नहीं, ईचागढ़ जिला परिषद सदस्य ज्योति लाल मांझी और एक राजनीतिक दल से भी प्रशंसा पत्र लिखवाने का काम किया गया है।
दिनेश शर्मा ने यह भी आरोप लगाया है कि प्रोसेनजीत घोष विस्थापितों के अधिकारों को कुचलने और मुआवजा पाने की प्रक्रिया को जटिल बनाने में दलालों के नेटवर्क का संचालन कर रहे हैं, जिसके चलते परियोजना से प्रभावित आम जनता आज भी अपने हक के लिए दर-दर भटक रही है। मुआवजा लेने के लिए विस्थापितों को दलालों के पास जाना मजबूरी बन चुका है।
ज्ञापन में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि मुख्यमंत्री सचिवालय ने पहले ही प्रोसेनजीत घोष की प्रतिनियुक्ति रद्द करने और उनका स्थानांतरण करने का आदेश जारी किया था, लेकिन कथित राजनीतिक संरक्षण के चलते वे अब भी उसी पद पर बने हुए हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि ज्ञापन में प्रोसेनजीत घोष पर असामाजिक तत्वों से मिलीभगत कर जान-माल की क्षति पहुंचाने की साजिश रचने का भी आरोप लगाया गया है।
दिनेश शर्मा ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराते हुए दोषियों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई की जाए और स्वर्णरेखा परियोजना में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और विस्थापित विरोधी रवैए पर अंकुश लगाया जाए।
इस ज्ञापन ने स्वर्णरेखा परियोजना की कार्यशैली, जवाबदेही और पारदर्शिता पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अब निगाहें मुख्यमंत्री कार्यालय की कार्रवाई पर टिकी हैं।


