सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो से चुनावी हलचल, दोनों पक्ष आमने-सामने

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सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो से चुनावी हलचल, दोनों पक्ष आमने-सामने

 

सरायकेला, 22 फरवरी : नगर पंचायत अध्यक्ष पद के चुनावी माहौल के बीच एक वायरल वीडियो को लेकर राजनीतिक वातावरण गर्म हो गया है। सोशल मीडिया पर प्रसारित इस वीडियो को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है और मामला कानूनी कार्रवाई की दिशा में बढ़ता दिख रहा है।

जानकारी के अनुसार, वीडियो उस समय का बताया जा रहा है जब एक पोर्टल एवं चैनल के पत्रकार प्रमोद सिंह, झामुमो समर्थित उम्मीदवार एवं पूर्व नगर पंचायत उपाध्यक्ष मनोज चौधरी के प्रचार से जुड़ी रिकॉर्डिंग कर रहे थे। संबंधित पक्ष का कहना है कि रिकॉर्डिंग के दौरान भाषा शैली समझाने की सामान्य प्रक्रिया को किसी अज्ञात व्यक्ति ने अलग संदर्भ में रिकॉर्ड कर लिया और बाद में उसे भ्रामक रूप में प्रसारित किया गया।

आरोप है कि उक्त वीडियो बाद में अभिषेक मिश्रा नामक व्यक्ति के पास पहुंचा, जिन्होंने इसे एक पोर्टल और यूट्यूब चैनल पर प्रसारित किया। मनोज चौधरी और उनके समर्थकों का कहना है कि वीडियो को इस तरह प्रस्तुत किया गया जिससे उनकी और संबंधित राजनीतिक दल की छवि प्रभावित हो।

हालांकि, अभिषेक मिश्रा की ओर से इस संबंध में अब तक कोई औपचारिक बयान सामने नहीं आया है। उनके पक्ष की प्रतिक्रिया मिलने के बाद ही पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचाने के उद्देश्य से अधूरी या भ्रामक सामग्री प्रसारित की जाती है, तो भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और 500 के तहत मानहानि का मामला बन सकता है। वहीं, डिजिटल माध्यम से आपत्तिजनक या भ्रामक सामग्री के प्रसारण पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के प्रावधान भी लागू हो सकते हैं। चुनावी संदर्भ में यदि सामग्री का उद्देश्य मतदाताओं को प्रभावित करना सिद्ध होता है, तो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत भी कार्रवाई संभव है।

सूत्रों के मुताबिक, संबंधित पक्ष ने वीडियो से जुड़े डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित कर लिए हैं और साइबर सेल में शिकायत दर्ज कराने की तैयारी की जा रही है। साथ ही, आवश्यक होने पर कानूनी नोटिस भेजने और न्यायालय से वीडियो हटाने की मांग करने की बात भी कही जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी समय में सोशल मीडिया की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे में किसी भी सामग्री के प्रसारण से पहले उसकी सत्यता और संदर्भ की पुष्टि आवश्यक है, ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।

फिलहाल मामला जांच और संभावित कानूनी कार्रवाई की ओर बढ़ रहा है। अब यह देखना होगा कि जांच के बाद तथ्यों की स्थिति क्या सामने आती है और संबंधित पक्षों की ओर से क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया आती है।

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