स्वर्णरेखा में ‘सफाई’ के नाम पर खनन? मनीकुई पुल के नीचे पोकलेन से बालू उठाव पर सवाल

Manbhum Updates
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सरायकेला/कांड्रा, 18 अप्रैल : जिले के कांड्रा थाना क्षेत्र स्थित स्वर्णरेखा नदी के मनीकुई पुल के नीचे कथित “नदी सफाई” के नाम पर बड़े पैमाने पर बालू उठाव का मामला अब गंभीर प्रशासनिक सवालों के घेरे में आ गया है। मानभूम अपडेट्स की खबर के बाद खनन विभाग से जुड़े एक अधिकारी ने अपुष्ट सूचना दी है कि “पानी उपलब्ध कराने के लिए गड्ढा खोदने” की अनुमति विभाग ने दी है, लेकिन जमीनी तस्वीर इस दावे पर कई तरह के सवाल खड़ा कर रही है।

दिनदहाड़े चार पोकलेन, ‘सफाई’ या संगठित खनन?

स्थानीय लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मनीकुई पुल के नीचे एक साथ चार-चार पोकलेन मशीनों से नदी के भीतर गहराई तक खुदाई कर बालू निकाला जा रहा है। यह गतिविधि न केवल खुलेआम हो रही है, बल्कि इसमें भारी मात्रा में बालू का उठाव भी शामिल बताया जा रहा है। ऐसे में “सफाई” और “खनन” के बीच की रेखा धुंधली होती दिख रही है।

कानूनी पेंच : क्या अनुमति पर्याप्त है?

विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी नदी क्षेत्र में इस प्रकार की खुदाई और खनन के लिए कई स्तरों पर अनुमति अनिवार्य होती है। इसके लिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय या राज्य सरकार के पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण से पर्यावरणीय स्वीकृति लेनी पड़ती है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा तय मानकों के अनुरूप नदी क्षेत्र प्रबंधन और केंद्रीय दिशा-निर्देश की जरूरत होती है। राज्य खनन विभाग से खनन लीज/ परमिट/ अनापत्ति प्रमाण-पत्र लेने के साथ कई प्रकार की प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। यदि इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं हुआ है, तो यह गतिविधि सीधे तौर पर अवैध खनन की श्रेणी में आ सकती है।

पुल की सुरक्षा पर खतरा

मनीकुई पुल के पिलरों के आसपास इस तरह की गहरी खुदाई से “स्कॉरिंग” (Scouring) का खतरा बढ़ जाता है, जिससे पुल की नींव कमजोर हो सकती है। सिविल इंजीनियरिंग विशेषज्ञों का कहना है कि नदी तल से अत्यधिक बालू निकासी से जलधारा का प्रवाह बदलता है और संरचनात्मक स्थिरता प्रभावित होती है, जो भविष्य में किसी बड़े हादसे की वजह बन सकती है।

“पानी के लिए गड्ढा” तर्क पर सवाल

खनन विभाग द्वारा दिए गए तर्क कि जानवरों, इंसानों और कंपनियों को पानी उपलब्ध कराने के लिए गड्ढे खोदे जा रहे हैं, इस पर भी स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं।
क्या नदी में पानी उपलब्ध कराना खनन विभाग का कार्यक्षेत्र है?
क्या जानवर नदी के बीच गहरे गड्ढों से पानी पीते हैं, या किनारे से?
क्या पुल के नीचे ही पानी संग्रहण की जरूरत है, अन्य सुरक्षित स्थान क्यों नहीं चुने गए?
गड्ढे खोदने के दौरान किसी मजिस्ट्रेट अथवा सक्षम पदाधिकारी की नियुक्ति क्यों नहीं?
इन सवालों का कोई स्पष्ट और आधिकारिक जवाब अभी तक सामने नहीं आया है।

‘नीलामी’ का हवाला—कानूनी या आड़?

सूत्रों के मुताबिक, निकाले जा रहे बालू को “नीलामी” से जोड़कर वैध ठहराने की कोशिश की जा रही है। लेकिन यहां जानबूझकर अवैध रूप से बालू खनन और उसकी निकासी की जा रही है। फिर उस बालू की नीलामी करवाने का हवाला देकर इस अवैध कार्य को सही ठहराने की कोशिश की जा रही है।

प्रशासन की चुप्पी, बढ़ता जनाक्रोश

स्थानीय लोगों में इस पूरे मामले को लेकर आक्रोश है। उनका कहना है कि अगर यह कार्य वैध है तो प्रशासन सार्वजनिक रूप से आदेश और अनुमति की प्रति जारी करे। वहीं यदि अनियमितता है, तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित लोगों  पर तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए।

जवाबदेही तय करने की मांग

अब मुख्य सवाल यही है— किसने दी यह “कथित अनुमति”? किस आधार पर दी गई? और क्या सभी कानूनी प्रावधानों का पालन हुआ?
मानभूम अपडेट्स इस पूरे मामले की पड़ताल जारी रखे हुए है। आने वाले दिनों में इस कथित “सफाई” के पीछे की वास्तविकता और जिम्मेदार चेहरों का खुलासा करेगी। फिलहाल, प्रशासन और खनन विभाग की चुप्पी इस पूरे प्रकरण को और संदिग्ध बना रही है।

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