1999 से जल रही आस्था की अखंड ज्योत, अशोकपुर में 8 नवंबर की रात तांत्रिक विधि से होगी मां श्मशान काली की आराधना

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झारखंड के विभिन्न जिलों से जुटेंगे श्रद्धालु, संध्या में निकलेगी कलश यात्रा; मन्नतों और मान्यताओं से जुड़ा है मां का दरबार

सरायकेला, 04 नवंबर : आस्था, साधना और रहस्यमयी धार्मिक परंपरा का अनूठा संगम देखने को मिलेगा सरायकेला-खरसावां जिले के राजनगर प्रखंड अंतर्गत भुईयानाचना गांव के अशोकपुर में। यहां 8 नवंबर की रात मां श्मशान काली की आराधना विशेष तांत्रिक पद्धति से की जाएगी। वर्ष 1999 में शुरू हुई यह पूजा अब क्षेत्र की विशिष्ट धार्मिक पहचान बन चुकी है। तीन दशक के करीब पहुंच चुकी इस परंपरा के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था लगातार बढ़ रही है।

श्मशान काली की इस पूजा का आकर्षण केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। मां के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था और मनोकामना पूरी होने की मान्यताएं भी इस आयोजन को खास बनाती हैं। प्रत्येक वर्ष सरायकेला-खरसावां सहित झारखंड के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में भक्त यहां पहुंचते हैं। श्रद्धालु मां के दरबार में माथा टेकते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मन्नत मांगते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद मां अवश्य पूरी करती हैं।

आयोजन की शुरुआत 8 नवंबर की संध्या कलश यात्रा से होगी। इसमें गांव की महिलाओं, पुरुषों और श्रद्धालुओं की भागीदारी रहेगी। इसके बाद रात्रि में पारंपरिक विधि-विधान के साथ तांत्रिक पद्धति से मां श्मशान काली की पूजा-अर्चना की जाएगी।

श्रद्धालुओं की संभावित भीड़ को देखते हुए आयोजकों ने तैयारियां तेज कर दी हैं। पूजा स्थल के आसपास साफ-सफाई के साथ दूर-दराज से आने वाले भक्तों के वाहनों के लिए पार्किंग की व्यवस्था की जा रही है। आयोजन को सफल बनाने में स्थानीय युवाओं और ग्रामीणों की टोली जुटी हुई है।

शिवा महतो, रोहित महतो, अजय महतो, भरत महतो, विश्वजीत महतो, तूफान सरदार, अमित सरदार और नयन महतो सहित कई ग्रामीण व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

तीन दशक से कायम इस धार्मिक परंपरा ने अशोकपुर को अलग पहचान दी है। आयोजकों का प्रयास है कि इस वर्ष भी मां श्मशान काली की पूजा श्रद्धा, भक्ति और बेहतर व्यवस्था के साथ संपन्न हो तथा दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं को किसी तरह की असुविधा न हो।

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