वाहिनी और ग्रामीणों के आरोपों पर बवाल – वन विभाग पर लगे सैकड़ों पेड़ कटवाने के गंभीर आरोप

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वाहिनी और ग्रामीणों के आरोपों पर बवाल – वन विभाग पर लगे सैकड़ों पेड़ कटवाने के गंभीर आरोप

स्थल निरीक्षण में आरोप सही पाए गए

चांडिल, 28 सितंबर : दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी, जिसे इको सेंसेटिव जोन घोषित किया गया है, वहां पेड़ों की कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध है। केवल सूखी लकड़ी और पत्तियों को चुनने की अनुमति ग्रामीणों को दी जाती है। इसके बावजूद सैकड़ों हरे-भरे साल समेत बड़े-बड़े पेड़ों की अवैध कटाई का सनसनीखेज मामला सामने आया है—और आरोप सीधे वन विभाग के अधिकारियों पर लगे हैं।

शनिवार को चांडिल प्रखंड के माकुलाकोचा में झारखंड मुक्ति वाहिनी की बैठक के दौरान ग्रामीणों ने खुलासा किया कि खुद विभाग के संरक्षण में पेड़ काटे गए और रातोंरात उन्हें हटा दिया गया। ग्रामीणों का कहना है कि जिस जंगल को वर्षों से आदिवासी समुदाय ने अपनी जान पर खेलकर लकड़ी माफियाओं से बचाया, आज उसी जंगल को वन विभाग के लोग ही बेच रहे हैं।

स्थल निरीक्षण में कटाई की पुष्टि

ग्रामीणों के आरोपों के बाद बैठक के उपरांत जब मीडिया कर्मियों एवं ग्रामीणों ने मौके का दौरा किया तो हाल ही में कटे हुए पेड़ों के ठूंठ साफ दिखाई दिए। कई बड़े और छोटे पेड़ जड़ों से काट दिए गए थे। ग्रामीणों का कहना है कि विभागीय मिलीभगत के बिना इतनी बड़ी मात्रा में कटाई असंभव है, क्योंकि स्थल के बगल में ही माकुलाकोचा गेस्ट हाउस मौजूद है और महज 200 मीटर की दूरी पर चेक नाका भी है, जहां वन विभाग के सुरक्षाकर्मी तैनात रहते हैं।

 

वन विभाग के खिलाफ और भी गंभीर आरोप

ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि विभागीय अधिकारी दलमा अभयारण्य क्षेत्र में अवैध पत्थर खनन करवा रहे हैं और उस पत्थर को सरकारी कार्यों में उपयोग किया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि जहां पेड़ काटे गए हैं, वहां वन विभाग भवन निर्माण की तैयारी कर रहा है। यह जानकारी आरोपों को और भी मजबूत करती है कि पेड़ों की कटाई विभागीय आदेश पर ही हुई।

ग्रामीणों में गुस्सा, जांच की मांग

ग्रामीणों ने कहा कि अब सवाल यह है कि अगर वन विभाग ही जंगल काटेगा तो फिर जंगल की रक्षा कौन करेगा। उन्होंने सरकार से उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। ग्रामीणों का साफ कहना है कि अगर दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे।

मौके से लिए गए कटे हुए पेड़ों के फोटो और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान इस गंभीर आरोप की पुष्टि करते हैं। अब सवाल उठता है—क्या वन विभाग पर लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी या मामला दबा दिया जाएगा?

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