नवरात्रि के पांचवें दिन हुई मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चना, चारों ओर भक्ति का माहौल

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नवरात्रि के पांचवें दिन हुई मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चना, चारों ओर भक्ति का माहौल

चांडिल, 27 सितंबर : शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन शनिवार को देवी दुर्गा के पांचवे स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चना की गई। विभिन्न मंदिरों, वूजा पंडालों और श्रद्धालुओं ने अपने घरों में कलश स्थापित कर माता की विधिवत पूजा की। चौका में सार्वजनिक श्रीश्री नवदुर्गा पूजा कमेटी की ओर से नवदुर्गा मंदिर में स्थापित देवी की भव्य व आकर्षक प्रतिमा के समक्ष पूजा अर्चना करने के लिए शनिवार को बड़ी संख्या में भक्त पहुंचे। सुबह कलश स्थापना के बाद देवी की पूजा-अर्चना और चंडीपाठ प्रारंभ हुआ। पूजा-अर्चना के बाद भक्तों के बीच प्रसाद का वितरण किया गया। यहां प्रतिदिन श्रद्धालुओं के लिए महाप्रसाद की भी व्यवस्था है।

भक्तों पर पुत्र के समान स्नेह बरसाती है मां

देवी दुर्गा का पांचवां स्वरूप मां स्कंदमाता भगवान कार्तिकेय की माता हैं। भगवान कार्तिकेय को स्कंद भी कहा जाता है। स्कंदमाता मातृत्व, वात्सल्य, करुणा और ज्ञान का प्रतीक हैं। वे अपनी गोद में भगवान स्कंद को बालरूप में धारण करती हैं। कमल के आसन पर विराजित होने के कारण इन्हें ‘पद्मासना’ भी कहा जाता है। मान्यता के अनुसार मां स्कंदमाता की पूजा करने से भक्तों को संतान सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। उनकी उपासना से नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और ज्ञान, विवेक तथा मोक्ष का मार्ग सुलभ होता है। माना जाता है कि मां अपने भक्तों पर अपने पुत्र के समान स्नेह और करुणा बरसाती हैं।

क्या है पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में तारकासुर नामक एक शक्तिशाली राक्षस ने घोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त किया था कि उसकी मृत्यु केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही होगी। तारकासुर को पता था कि शिव वैरागी हैं और उनका कोई पुत्र नहीं है, इसलिए वह निर्भय होकर तीनों लोकों में अत्याचार करने लगा। उसके अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं ने ब्रह्मा जी द्वारा दिए गए सलाह के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह कराया। उनके विवाह के बाद, कार्तिकेय (स्कंद) का जन्म हुआ। बालक स्कंद बड़े होकर एक महान योद्धा बने और उन्होंने तारकासुर का वध करके देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई।

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