चांडिल : आदिम डेवलपमेंट सोसाइटी स्कूल में भावुक क्षणों की गवाही बनी आज की सुबह, बच्चों ने दी दिशोम गुरु को श्रद्धांजलि

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चांडिल : आदिम डेवलपमेंट सोसाइटी स्कूल में भावुक क्षणों की गवाही बनी आज की सुबह, बच्चों ने दी दिशोम गुरु को श्रद्धांजलि

चांडिल, 05 अगस्त : प्रखंड के सालगाडीह – ग्वालापाड़ा का आदिम डेवलपमेंट सोसाइटी स्कूल मंगलवार को सिर्फ एक शिक्षण संस्थान नहीं रहा — वह एक ऐसा स्थल बन गया जहाँ एक पीढ़ी ने अपने पुरखे को याद किया, जिसने उसके अस्तित्व की लड़ाई लड़ी थी। दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन के बाद, इस आदिवासी बहुल इलाके में शोक की लहर सिर्फ औपचारिक नहीं थी, बल्कि दिल से बहती एक भावना थी।

सुबह जैसे ही विद्यालय परिसर में छात्र-छात्राएं एकत्रित हुए, चारों ओर एक गम्भीर मौन पसरा था। शिक्षकगण के चेहरे पर उदासी और सम्मान की मिश्रित झलक साफ झलक रही थी। सैकड़ों मासूम आंखें, जिनमें शायद दिशोम गुरु के संघर्ष की गहराई पूरी तरह दर्ज न हो, फिर भी उनकी उपस्थिति की अनुभूति जरूर थी।

श्रद्धांजलि सभा शुरू हुई। एक मिनट का मौन — पर यह मौन किसी शोर से कम न था। यह मौन था उनके लिए, जिन्होंने जंगलों से संसद तक आदिवासी अस्मिता की मशाल को थामे रखा। शिक्षकों की आंखें नम थीं, और कुछ की आवाज़ें भी काँप रही थीं, जब उन्होंने गुरुजी के संघर्षों की झलक साझा की।

स्कूल के शिक्षकों ने कहा “वे केवल एक नेता नहीं थे, वे हमारी चेतना थे, उन्होंने हमें सिखाया कि हक मांगा नहीं जाता, लड़ा जाता है।”

सभा में दुर्गा रानी सोरेन, बाबूराम सोरेन, देवलाल सोरेन, अनीता सोरेन, विजय मुर्मू, एक्स आर्मी सुदन टुडू, बबलू टुडू, लालमोहन मुर्मू, भरत मुर्मू, सुमित्र मुर्मू, कुमारी और छवि बारिक आदि शामिल रहे। उनकी उपस्थिति ने इस श्रद्धांजलि को केवल एक स्कूली कार्यक्रम न रखकर, एक सामूहिक स्मृति समारोह में बदल दिया।

अंत में बच्चों ने अपने छोटे हाथों को जोड़कर संकल्प लिया — “हम दिशोम गुरु के दिखाए रास्ते पर चलेंगे, अपने हक और अपनी जड़ों से कभी समझौता नहीं करेंगे।”

आज गांव की सुबह एक ऐसे नायक को याद कर रही थी, जिसकी विरासत सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि इन बच्चों की सोच में अब धीरे-धीरे आकार ले रही है।

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