शिबू सोरेन का अंतिम संस्कार नेमरा गांव में, जहां से शुरू हुआ था ऐतिहासिक धान कटनी आंदोलन

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शिबू सोरेन का अंतिम संस्कार नेमरा गांव में, जहां से शुरू हुआ था ऐतिहासिक धान कटनी आंदोलन

रांची, 04 अगस्त : झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री, राज्यसभा सांसद और झारखंड आंदोलन के प्रणेता दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन के बाद पूरे राज्य में शोक की लहर है। इसी बीच प्रशासन ने उनके अंतिम संस्कार की तैयारियां तेज कर दी हैं। दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में अंतिम सांस लेने के बाद अब उनके पार्थिव शरीर को विशेष विमान के जरिए रांची लाया जाएगा।

राजधानी रांची स्थित मोरहाबादी इलाके में उनके आवास पर पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा, जहां आमजन, राजनेता और गणमान्य नागरिक उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। इसके पश्चात उन्हें राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जाएगी।

जहां से आंदोलन की शुरुआत की, वहीं होगा विदाई

शिबू सोरेन का अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव नेमरा में किया जाएगा। यह वही गांव है, जहां से उन्होंने किशोरावस्था में महाजनों और साहूकारों के खिलाफ धान कटनी आंदोलन की शुरुआत की थी। नेमरा गांव, झारखंड के रामगढ़ जिले के गोला प्रखंड में स्थित है और यहीं उनका जन्म भी हुआ था।

गुरुजी के एक परिजन ने बताया कि यह परिवार की परंपरा रही है कि अंतिम संस्कार पैतृक गांव में ही किया जाता है। इसलिए गुरुजी की अंतिम विदाई भी उसी भूमि पर होगी, जहां उन्होंने अन्याय और शोषण के खिलाफ अपने संघर्ष की नींव रखी थी।

पिता की शहादत बनी संघर्ष की प्रेरणा

शिबू सोरेन के पिता सोबरन मांझी एक शिक्षक और किसान थे, जिन्होंने आदिवासी समाज को महाजनी प्रथा के खिलाफ जागरूक करने का बीड़ा उठाया था। उनके इसी सामाजिक आंदोलन से घबराकर साहूकारों ने उनकी हत्या कर दी थी। पिता की शहादत से प्रेरित होकर शिबू सोरेन ने अपने किशोर जीवन में ही अन्याय के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था।

उन्होंने आदिवासियों की एकजुटता के बल पर धान कटनी आंदोलन चलाया, जिसमें महाजनों द्वारा हड़पे गए खेतों में सामूहिक रूप से धान की फसल काटी जाती थी। यह आंदोलन कोयलांचल से लेकर संथाल परगना तक गूंज उठा था।

यहीं से बनी झारखंड आंदोलन की नींव

इसी आंदोलन की पृष्ठभूमि में शिबू सोरेन ने आगे चलकर बिनोद बिहारी महतो और एके राय जैसे नेताओं के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) का गठन किया। यही संगठन आगे चलकर अलग झारखंड राज्य आंदोलन की आधारशिला बना।

अब उसी नेमरा गांव की मिट्टी पर गुरुजी को अंतिम विदाई दी जाएगी, जहां से उन्होंने सामाजिक क्रांति का आरंभ किया था। यह केवल एक अंतिम संस्कार नहीं, बल्कि उस संघर्ष को प्रणाम है जिसने झारखंड की पहचान गढ़ी।

 

रिपोर्टः ManbhumUpdates.com

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