डाकिया योजना धराशायी, आदिम जनजाति परिवार पांच किलोमीटर पैदल जाकर लेते हैं राशन

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डाकिया योजना धराशायी, आदिम जनजाति परिवार पांच किलोमीटर पैदल जाकर लेते हैं राशन

चांडिल, 01 अगस्त : झारखंड सरकार की महत्वाकांक्षी पीवीटीजी डाकिया मुख्यमंत्री खाद्य सुरक्षा योजना का उद्देश्य राज्य के आदिम जनजाति (PVTG) समुदायों को उनके घरों तक राशन पहुंचाना था, लेकिन सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल प्रखंड अंतर्गत चिलगु पंचायत के माकुलाकोचा सबर बस्ती में यह योजना पूरी तरह फेल होती दिख रही है। यहां नौ सबर परिवारों में से केवल एक परिवार को गांव के डीलर से राशन मिल रहा है, जबकि शेष आठ परिवारों को हर माह लगभग पांच किलोमीटर दूर जाकर राशन लाना पड़ता है।

योजना का उद्देश्य, लेकिन हकीकत कुछ और

साल 2016 में झारखंड सरकार ने आदिम जनजातीय समुदायों को ध्यान में रखते हुए यह योजना शुरू की थी, जिसके तहत चिन्हित पीवीटीजी परिवारों को डाकिया के माध्यम से 35 किलो राशन के बंद बोरे उनके घरों तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई थी। इसका उद्देश्य यह था कि दूर-दराज और दुर्गम इलाकों में रहने वाले लोग भी खाद्य सुरक्षा से वंचित न रहें।

लेकिन माकुलाकोचा बस्ती के आठ परिवारों की स्थिति इस योजना की जमीनी हकीकत को उजागर कर रही है। इन लोगों को राशन प्राप्त करने के लिए अपने गांव से लगभग पांच किलोमीटर दूर स्थित चाकुलिया गांव के राशन डीलर की दुकान तक जाना पड़ता है। रास्ता दुर्गम है, और आदिवासी बुजुर्गों, महिलाओं व बच्चों के लिए यह एक चुनौती बन चुका है।

स्थानीय निवासी लखन सबर ने बताया कि उन्हें हर माह समय पर राशन नहीं मिल पाता। कई बार तो वे राशन लेने समय पर नहीं पहुंच पाते, जिससे उन्हें उस महीने का राशन नहीं मिल पाता। उन्होंने यह भी बताया कि जो राशन उन्हें मिलता है, उसमें केवल चावल ही दिया जाता है, जबकि गांव में ही राशन लेने वाले एक अन्य परिवार को चावल के साथ चीनी, दाल और नमक भी उपलब्ध कराया जा रहा है।

लखन सबर का कहना है कि – “सरकार हमारी चिंता तो करती है, योजना भी बनाती है, लेकिन उसे लागू करने में कोई रुचि नहीं दिखती। हम आदिवासियों की तकलीफ कोई नहीं समझता।”

प्रशासनिक लापरवाही या सिस्टम की खामी?

यह सवाल उठना लाज़मी है कि जब राज्य सरकार द्वारा योजना स्पष्ट रूप से हर पीवीटीजी परिवार को घर-घर राशन पहुंचाने के लिए बनी है, तो माकुलाकोचा जैसे गांवों में इसे लागू क्यों नहीं किया जा रहा है? क्या यह राशन डीलरों की मनमानी है, या फिर प्रशासनिक उदासीनता इसका कारण है?

मांग – व्यवस्था में सुधार और निगरानी जरूरी

ग्रामीणों की मांग है कि सरकार इस विषय पर गंभीरता से ध्यान दे और डाकिया योजना को सही तरीके से लागू करने के लिए निगरानी तंत्र मजबूत करे। साथ ही, सभी लाभुकों को समान रूप से राशन सामग्री दी जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी आदिम जनजातीय परिवार भूख या अधिकार से वंचित न हो।

माकुलाकोचा सबर बस्ती की स्थिति यह स्पष्ट करती है कि जनकल्याणकारी योजनाएं तब तक सार्थक नहीं हो सकतीं, जब तक उनकी सक्रिय मॉनिटरिंग और ईमानदार क्रियान्वयन सुनिश्चित न किया जाए। यदि सरकार सचमुच आदिम जनजातियों की भलाई चाहती है, तो उसे ऐसी शिकायतों पर त्वरित और कठोर कार्रवाई करनी होगी, नहीं तो ये योजनाएं केवल कागज़ों तक ही सीमित रह जाएंगी।

 

रिपोर्ट: ManbhumUpdates.com

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