मानभूम के इतिहास और बंटवारे पर शैलेंद्र महतो ने उठाए सवाल, कहा- पुरुलिया की पहचान को समझने के लिए इतिहास जानना जरूरी
जमशेदपुर, 24 सितंबर: पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के कोड़ाडीह गांव में 20 सितंबर को आयोजित “कुड़मी महाजुटान” के संदर्भ में पूर्व सांसद एवं झारखंड आंदोलन के अगुवा नेता शैलेंद्र महतो ने मानभूम के इतिहास और उसके बंटवारे को लेकर विस्तृत टिप्पणी की है। सोशल मीडिया पर जारी अपने लेख में उन्होंने मानभूम के ऐतिहासिक अस्तित्व, 1956 के राज्य पुनर्गठन और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर कई सवाल उठाए हैं।
शैलेंद्र महतो ने अपने लेख की शुरुआत पुरुलिया के ऐतिहासिक संदर्भ से करते हुए कहा है कि छोटानागपुर पठार को अलग-अलग प्रशासनिक क्षेत्रों में बांटे जाने की प्रक्रिया के साथ मानभूम जिले का भी विभाजन हुआ। उनके अनुसार, मानभूम तत्कालीन बिहार राज्य के छोटानागपुर कमिश्नरी का एक प्रमुख जिला था। आजादी के बाद छोटानागपुर कमिश्नरी में रांची, हजारीबाग, मानभूम, सिंहभूम और पलामू जिले शामिल थे।
उन्होंने ऐतिहासिक पुस्तकों का उल्लेख करते हुए मानभूम और कुड़मी समाज के संबंधों का भी जिक्र किया है। लेख में Edward Tuite Dalton की 1872 में प्रकाशित Descriptive Ethnology of Bengal तथा H.H. Risley की Tribes and Castes of Bengal का हवाला देते हुए मानभूम के पंचेत राज परिवार को कुड़मी से संबंधित बताया गया है। महतो ने दावा किया है कि तत्कालीन अंग्रेजी शासन के कई गजेटियर और ऐतिहासिक दस्तावेजों में भी कुड़मी समुदाय के संबंध में विभिन्न उल्लेख मिलते हैं।
शैलेंद्र महतो के अनुसार, अंग्रेजी शासन के दौरान पुरुलिया मानभूम जिले का मुख्यालय था। राज्य पुनर्गठन के दौरान मानभूम के 16 थानों को पश्चिम बंगाल में शामिल कर पुरुलिया जिले का गठन किया गया। इनमें झालदा, जयपुर, आड़सा, बागमुंडी, बलरामपुर, हुड़ा, बराबाजार, पुरुलिया मुफस्सिल, पाड़ा, रघुनाथपुर, नेतुड़िया, शांतुड़ी, काशीपुर, पुंचा, मानबाजार और बांदवान शामिल थे।
उन्होंने अपने लेख में दावा किया कि मानभूम के दक्षिणी हिस्से के ईचागढ़, नीमडीह, चांडिल और पटमदा थानों को तत्कालीन सिंहभूम जिले में शामिल किया गया, जबकि मानभूम के अन्य हिस्से बिहार में रहे।
तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व पर भी उठाए सवाल
शैलेंद्र महतो ने मानभूम के बंटवारे को लेकर तत्कालीन बिहार के राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने दावा किया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह और बिहार मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले अनुग्रह नारायण सिंह ने इसका प्रभावी विरोध नहीं किया। उन्होंने इसके पीछे तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को कारण बताया है।
लेख में महतो ने यह भी कहा है कि “लोक सेवक संघ” के सांसद भोजोहरी महतो और उनके साथ छह विधायकों ने मानभूम के विभाजन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वहीं, उन्होंने झारखंड पार्टी की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि बिहार विधानसभा में पार्टी के नेता सुशील कुमार बागे ने बिहार पुनर्गठन विधेयक, 1956 पर लंबा भाषण दिया था, लेकिन विरोध का स्वरूप प्रभावी नहीं रहा।
महतो ने अपने लेख में यह दावा भी किया है कि झारखंड पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष और सांसद जयपाल सिंह मुंडा ने लोकसभा में मानभूम के बंटवारे का समर्थन किया था।
शैलेंद्र महतो ने कहा है कि मानभूम का इतिहास केवल पुरुलिया तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि वर्तमान झारखंड और पश्चिम बंगाल के कई हिस्सों की ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि मानभूम का नाम आज सरकारी नक्शों और प्रशासनिक इकाइयों में भले ही दिखाई नहीं देता, लेकिन इतिहास में इसका महत्वपूर्ण स्थान दर्ज है।
महतो ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट के अंत में लिखा है कि मानभूम के बंटवारे और उससे जुड़े राजनीतिक घटनाक्रम पर वे अपनी बात की “दूसरी कड़ी” में आगे विस्तार से रखेंगे।



