जेनेवा में आयोजित UN Business & Human Rights Forum में उठा जादूगोड़ा माइनिंग का मुद्दा

कुणाल षडंगी ने वैश्विक मंच पर रखा आदिवासियों का दर्द
रांची, 25 नवंबर : संयुक्त राष्ट्र के जेनेवा स्थित यूरोपियन मुख्यालय में चल रहे UN Business and Human Rights Forum की 14वीं वार्षिक बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए कुणाल षडंगी ने जादूगोड़ा क्षेत्र में यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (UCIL) की लगभग छह दशक पुरानी माइनिंग गतिविधियों से आदिवासी समुदायों पर पड़े व्यापक प्रभावों को मजबूती से उठाया। इस प्रतिष्ठित सम्मेलन में 50 से अधिक देशों के प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं, जहाँ व्यापार और मानवाधिकारों के बीच के जटिल संतुलन पर गहन चर्चा हो रही है।
कुणाल ने बताया कि जादूगोड़ा में संथाल, हो, मुंडा और उरांव समुदाय दशकों से विस्थापन, विकिरण और पर्यावरणीय क्षति जैसी गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि UCIL की वास्तविक उत्पादन क्षमता और गतिविधियों से जुड़ी महत्वपूर्ण सूचनाएँ Official Secrets Act, 1923 और सुरक्षा-आधारित प्रतिबंधों के कारण सार्वजनिक नहीं हो पातीं। यहाँ तक कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 भी इन मामलों में लगभग अप्रभावी साबित होता है।
उन्होंने कहा कि भारत में परमाणु ऊर्जा अधिनियम राज्य सरकारों को ऐसे परियोजनाओं में कोई संचालनात्मक अधिकार नहीं देता, जिससे स्थानीय प्रशासन और प्रभावित समुदाय निर्णय प्रक्रिया से बाहर हो जाते हैं। कुणाल ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की उस मांग का भी उल्लेख किया जिसमें उन्होंने आदिवासी भूमि और अधिकारों की रक्षा के लिए राज्य सरकारों को अधिक प्रशासनिक शक्तियाँ देने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
कुणाल ने कहा, “आदिवासियों की जमीन उनकी सबसे बड़ी पूँजी है। ऐसे उद्योगीकरण का कोई मतलब नहीं जो उनकी जमीन ले ले और उनके अधिकारों की रक्षा भी न कर सके। संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को इस वैश्विक मानवाधिकार मुद्दे पर भारत सरकार के साथ और गंभीरता से संवाद स्थापित करने की जरूरत है।”
जेनेवा में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं मानवाधिकार कार्य समूह की अध्यक्ष पचामोन योफानथोंग से भी मुलाकात की और पूरे मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की। कुणाल ने आशा जताई कि उनकी बातों को फोरम की अंतिम रिपोर्ट और सिफारिशों में उचित स्थान मिलेगा।
कुणाल की यह पहल न केवल जादूगोड़ा के प्रभावित समुदायों की आवाज़ को वैश्विक स्तर पर पहुँचा रही है, बल्कि व्यापार, खनन और मानवाधिकार के समीकरण पर भी महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय बहस को गति दे रही है।



