खानापूर्ति की ‘छापेमारी’ या मिलीभगत का खेल? अवैध बालू पर खनन विभाग की चुप्पी से उठे बड़े सवाल

Manbhum Updates
4 Min Read

खानापूर्ति की ‘छापेमारी’ या मिलीभगत का खेल? अवैध बालू पर खनन विभाग की चुप्पी से उठे बड़े सवाल

चांडिल, 12 फरवरी : सरायकेला-खरसावां जिले में अवैध बालू खनन और उसके निर्बाध परिवहन को लेकर एक बार फिर जिला खनन विभाग की कार्यशैली कटघरे में है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या विभाग सचमुच अवैध खनन पर रोक लगाने की मंशा रखता है, या फिर समय-समय पर खानापूर्ति कार्रवाई कर केवल औपचारिकता निभाई जा रही है? यह सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि क्षेत्र में लगातार हो रही चर्चाओं का नतीजा है।

एक ओर उपायुक्त नीतीश कुमार सिंह अवैध बालू खनन एवं परिवहन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए स्पष्ट रूप से प्रतिबद्ध नजर आते हैं। वे नियमित रूप से खनन टास्क फोर्स की बैठक लेते हैं, कार्रवाई की समीक्षा करते हैं और संबंधित अधिकारियों को सख्त निर्देश देते हैं। यह साफ संकेत है कि जिला प्रशासन राजस्व और पर्यावरण के नुकसान को किसी भी सूरत में बर्दाश्त करने के पक्ष में नहीं है।

लेकिन दूसरी ओर जिला खनन विभाग की कार्रवाईयों की वास्तविकता कुछ और कहानी बयां करती है। छिटपुट छापेमारी, इक्का-दुक्का जब्ती और प्रेस नोट जारी कर अपनी पीठ थपथपाने की परंपरा जारी है, जबकि जमीनी स्तर पर अवैध बालू से लदे वाहन धड़ल्ले से सड़कों पर दौड़ते देखे जा सकते हैं। यदि विभाग वास्तव में गंभीर है, तो फिर जिले के प्रमुख टोल प्लाजा—चांडिल थाना क्षेत्र के पाटा और कांड्रा थाना क्षेत्र के गिद्दीबेड़ा—के पास नियमित जांच क्यों नहीं की जाती?

ये दोनों स्थान ऐसे हैं जहां हर भारी वाहन को टोल टैक्स के लिए रुकना ही पड़ता है। पर्याप्त पार्किंग स्पेस उपलब्ध है, वाहनों के भागने की संभावना नगण्य है और दस्तावेजों की मौके पर ही जांच संभव है। यदि खनन विभाग यहां रोजाना बालू लदे वाहनों के ई-चालान, ई-वे बिल और अन्य वैध कागजात की सघन जांच शुरू कर दे, तो “दूध का दूध और पानी का पानी” होने में देर नहीं लगेगी।

स्थानीय लोगों का कहना है कि विभाग जानबूझकर उन स्थानों से दूरी बनाता है जहां सख्त और प्रभावी कार्रवाई संभव है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या कुछ खास रूट और खास वाहनों को ‘सुरक्षित मार्ग’ दिया जा रहा है? यदि नहीं, तो फिर टोल प्लाजा जैसे रणनीतिक बिंदुओं पर स्थायी जांच व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जाती?

अवैध बालू खनन से न केवल सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान होता है, बल्कि नदियों का अस्तित्व, पर्यावरण संतुलन और ग्रामीण इलाकों की पारिस्थितिकी भी खतरे में पड़ जाती है। ऐसे में खनन विभाग की आधी-अधूरी कार्रवाई संदेह को और गहरा कर रही है।

अब समय आ गया है कि जिला खनन विभाग स्पष्ट करे—क्या वह अवैध खनन के खिलाफ सख्त अभियान चलाने को तैयार है, या फिर खानापूर्ति की परंपरा ही आगे भी जारी रहेगी? जिले की जनता और प्रशासन की मंशा साफ है, अब निगाहें खनन विभाग की नीयत और कार्रवाई पर टिकी हैं।

Share This Article