संघीय ढांचे और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हो रहे हमलों के खिलाफ संगठनों का संयुक्त बयान

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संघीय ढांचे और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हो रहे हमलों के खिलाफ संगठनों का संयुक्त बयान

मणिपुर, लद्दाख, छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड की घटनाओं का किया जिक्र

जमशेदपुर, 29 सितंबर : झारखंड आंदोलन से जुड़े विभिन्न संगठनों, सामाजिक न्याय के कार्यकर्ताओं और जनांदोलन के प्रतिनिधियों ने सोमवार को एक संयुक्त प्रेस बयान जारी करते हुए देशभर के मेहनतकश तबकों, आदिवासी, सदानी और अल्पसंख्यक समुदायों से एकता बनाए रखने और भारत के संघीय ढांचे पर हो रहे “सुनियोजित हमलों” के खिलाफ मुखर आवाज उठाने की अपील की।

नेताओं ने कहा कि मणिपुर, लद्दाख, छत्तीसगढ़, ओडिशा, कश्मीर और झारखंड समेत देश के कई हिस्सों में आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक और वंचित समुदायों की संस्कृति, अधिकार और स्वायत्तता पर लगातार हमले हो रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके पीछे आरएसएस-भाजपा की “एक राष्ट्र, एक भाषा, एक धर्म” की विचारधारा काम कर रही है, जिसका उद्देश्य भारत की विविधता को खत्म कर कॉरपोरेट पूंजी के हित साधना है।

मणिपुर की घटनाओं को उदाहरण बताते हुए कहा गया कि भाजपा की डबल इंजन सरकार ने पहाड़ी और मैदानी समुदायों के बीच जानबूझकर विभाजन पैदा किया और अल्पसंख्यक समुदायों के जीवन, संपत्ति व धार्मिक स्थलों पर हमले हुए। वहीं लद्दाख में सोनम वांगचुक जैसे शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों की गिरफ्तारी को छठी अनुसूची और राज्य के दर्जे की मांग कुचलने की कोशिश बताया गया।

प्रेस बयान में कहा गया कि छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्यों में प्राकृतिक संसाधनों की लूट और स्वायत्तता कमजोर करने की नीतियां लगातार लागू की जा रही हैं। झारखंड को भी आंतरिक मसलों में उलझाकर जनता को राष्ट्रीय स्तर की इन चालों के खिलाफ एकजुट होने से रोका जा रहा है।

नेताओं ने चेतावनी दी कि वर्तमान में चल रही SIR (मतदाता सूची पुनरीक्षण) प्रक्रिया को भी एक बड़े षड्यंत्र के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। दबे-कुचले और अल्पसंख्यक समुदायों के नाम मतदाता सूची से हटाने की कोशिशें उनकी राजनीतिक ताकत कमजोर करने की साजिश है।

प्रेस बयान में झारखंड के लोगों से अपील की गई कि वे संकीर्ण राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर अपने साझा सामाजिक रिश्तों और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करें। वक्ताओं ने कहा कि मौजूदा सरकार से मतभेद हो सकते हैं, लेकिन एक सेकुलर और लोकतांत्रिक सरकार का बने रहना सामूहिक इच्छा है। संघीय ढांचे और संविधान की रक्षा को सबसे बड़ी जिम्मेदारी बताया गया।

संगठनों ने संकल्प लिया कि वे भारत की विविधता और मेहनतकश तबकों—आदिवासी, सदानी और अल्पसंख्यक सभी समुदायों—के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्षरत रहेंगे। उन्होंने आह्वान किया कि लोग मतदाता सूची से अपना नाम हटने न दें, मताधिकार की रक्षा करें और कॉरपोरेट लूट व सांप्रदायिक विभाजन के खिलाफ आवाज उठाएं।

हस्ताक्षरकर्ता में बिन्दे सोरेन, अजीत तिर्की, पुष्कर महतो, मदन मोहन सोरेन, रजनी मुर्मू, अलोका कुजूर, दीपक रंजीत, नासिर खान, संगीता बेक, लक्ष्मी गोप, विश्वजीत प्रमाणिक, गौतम कुमार बोस समेत विभिन्न संगठन के सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं।

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