सरकार की उदासीनता पर ग्रामीणों की करारी चोट, श्रमदान से बनाया पुल

पटमदा (पूर्वी सिंहभूम), 06 जुलाई : बरसात के मौसम में करीब चार महीने तक गांवों का आपसी संपर्क पूरी तरह टूट जाता था। स्कूली बच्चों, शिक्षकों, चिकित्सकों और आम ग्रामीणों को आने-जाने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। गोबरसुई पंचायत के बटालुका और आमदापहाड़ी गांव के बीच बहने वाले नाले पर पुल न होने से वर्षों से परेशान ग्रामीणों ने कई बार स्थानीय विधायक और प्रशासन से गुहार लगाई, मगर नतीजा हर बार सिर्फ आश्वासन ही रहा।
सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की घोर उदासीनता और संवेदनहीनता तब और स्पष्ट हो गई जब लगातार मांगों के बावजूद पुल निर्माण का कोई प्रयास नहीं हुआ। मजबूर होकर ग्रामीणों ने खुद ही श्रमदान कर पुल बना डाला। इस पहल ने सरकार की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — जब जनता खुद अपने संसाधनों से सड़क और पुल बना सकती है, तो फिर सरकार और उसके करोड़ों के बजट का क्या औचित्य है?
यह इलाका नक्सल प्रभावित है, बावजूद इसके सरकार ने यहां विकास की अनदेखी की है। जिस तरह आम लोग जोखिम उठाकर नाले पर पुल बना रहे हैं, वह यह दिखाता है कि झारखंड में प्रशासन और जनप्रतिनिधि सिर्फ चुनाव के समय ही गांवों की सुध लेते हैं।
रविवार को ग्रामीणों ने बांस और लकड़ी की सहायता से पुल निर्माण कार्य पूरा कर लिया, जिससे अब पैदल और दोपहिया वाहनों से आवाजाही संभव हो सकेगी। इस सामूहिक श्रमदान में लगभग 60 ग्रामीणों ने हिस्सा लिया। प्रमुख रूप से सेलू सोरेन, हेराड़े सोरेन, हरायथ सोरेन, किस्टो सिंह, महेश मुर्मू, मुकेश सिंह, मोतीलाल सिंह और विकास सिंह शामिल थे।
यह सिर्फ एक पुल नहीं, बल्कि झारखंड सरकार और प्रशासन की नाकामी के खिलाफ जनता का सीधा जवाब है। यह घटना स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि यदि सरकारें निष्क्रिय रहें तो भी संगठित जनता अपनी समस्याओं का समाधान खुद कर सकती है — लेकिन क्या इसी दिन के लिए हमने लोकतंत्र चुना था?
> रिपोर्ट: ManbhumUpdates.com संवाददाता
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