राजदेव सिन्हा को मिला शांति सुमन साहित्य सम्मान-2026, आख्यान में लोकजीवन और साहित्य पर हुआ विमर्श
जमशेदपुर, 04 अक्टूबर : भोजपुरी भवन, गोलमुरी में रविवार को शांति सुमन साहित्य संस्थान, जमशेदपुर के तत्वावधान में “शांति सुमन के गीतों में गांव का परिवेश” विषय पर आख्यान एवं शांति सुमन साहित्य सम्मान-2026 समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में शांति सुमन की रचनाओं में गांव, लोकजीवन, मानवीय संवेदना और बदलते सामाजिक परिवेश को लेकर साहित्यकारों ने विचार रखे।
समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार शैलेन्द्र अस्थाना ने की। सुविख्यात कथाकार जयनंदन मुख्य अतिथि तथा कवयित्री डॉ. संध्या सिन्हा विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थीं। स्वागत संबोधन अजय महताब ने किया। संचालन साहित्यकार वरुण प्रभात ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन अरविंद विद्रोही ने किया।
समारोह में सुप्रसिद्ध कवि राजदेव सिन्हा को साहित्य के क्षेत्र में दीर्घकालीन योगदान और सृजनात्मक अवदान के लिए “शांति सुमन साहित्य सम्मान-2026” से सम्मानित किया गया। सम्मान समारोह का प्रमुख आकर्षण रहा।
आख्यान सत्र में अशोक शुभदर्शी, अरुण कुमार सज्जन, चेतना वर्मा और ज्योत्सना अस्थाना ने शांति सुमन के साहित्य पर विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कहा कि शांति सुमन के गीतों में गांव केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि उनकी रचनात्मक चेतना का महत्वपूर्ण आधार है। उनकी रचनाओं में गांव की मिट्टी की सोंधी गंध, लोकजीवन की सहजता, श्रमशील लोगों की आकांक्षाएं, रिश्तों की आत्मीयता और बदलते समय की पीड़ा दिखाई देती है।
वक्ताओं ने कहा कि शांति सुमन की रचनाधर्मिता गीतों के साथ पद, गद्य, नवगीत, जनगीत और उपन्यास तक विस्तृत है। उनके साहित्य में लोक और आधुनिकता के बीच संवाद दिखाई देता है। नवगीतों में समय की बेचैनी, जनगीतों में जनजीवन के संघर्ष और गद्य तथा उपन्यासों में सामाजिक यथार्थ और मानवीय संबंधों की पड़ताल प्रमुखता से उभरती है।
कार्यक्रम में शांति सुमन के चर्चित गीत “इसी शहर में ललमुनिया भी रहती थी बाबू” की प्रस्तुति काशीनाथ प्रजापति ने की। इसके अलावा प्रदीप कुमार दीपक, अर्चना अनुपम कर्ण, चेतना वर्मा, यमुना तिवारी व्यथित और वरुण प्रभात ने भी शांति सुमन के गीत प्रस्तुत किए। गीत-संगीत की प्रस्तुतियों ने समारोह के साहित्यिक वातावरण को भावपूर्ण बना दिया।
वक्ताओं ने कहा कि शांति सुमन का साहित्य अपनी जड़ों से जुड़ा साहित्य है। उनके यहां गांव अतीत की स्थिर तस्वीर नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक यथार्थ का जीवंत रूप है। उनकी रचनाओं में लोकसंस्कृति, स्मृति, संघर्ष, आत्मीयता, विस्थापन और आधुनिक चुनौतियां एक साथ दिखाई देती हैं।
कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ. राम कविन्द्र, उदय प्रताप हयात, चन्द्रकांत, आशुतोष चौबे, रीना सिन्हा सलोनी, आरती श्रीवास्तव, जयश्री शिवकुमार, मनोकामना सिंह अजय, जितेश तिवारी, संजय कुमार, रविन्द्र पाठक, मुकेश रंजन, निशा रंजन, मनीष कुमार, आशीष कुमार, आलोक कुमार, बिपिन मंडल, शशि मंडल, कुंदन कुमार, डॉ. अजय चौबे समेत अन्य साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों का योगदान रहा। समापन के बाद सभी ने सामूहिक रूप से भोजन ग्रहण किया।



