ईचागढ़ में बालू स्टॉक यार्डों की भरमार, लाखों सीएफटी बालू का स्रोत बना रहस्य

पूरे कोल्हान में एकमात्र वैध बालू घाट जारगोडीह में, फिर ईचागढ़ क्षेत्र में इतने निजी स्टॉक यार्ड में कहां से आते हैं बालू
सरायकेला-खरसावां, 15 जुलाई : कोल्हान प्रमंडल में बालू खनन और उसके भंडारण को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पूरे प्रमंडल में यदि किसी एक घाट को वैध रूप से स्वीकृति प्राप्त है, तो वह है सरायकेला-खरसावां जिले के ईचागढ़ थाना क्षेत्र के जारगोडीह घाट। यह घाट स्वर्णरेखा नदी पर स्थित है, जिसे राज्य सरकार द्वारा अधिकृत एजेंसी JSMDC (झारखंड राज्य खनिज विकास निगम) को संचालन के लिए सौंपा गया है।
JSMDC को राज्य सरकार ने न सिर्फ घाट संचालन बल्कि स्टॉक यार्ड स्थापित करने की भी अनुमति दी है। नियमानुसार कोई भी निजी एजेंसी केवल JSMDC से ही बालू खरीदकर भंडारण या बिक्री कर सकती है। परंतु जमीनी सच्चाई इन नियमों को नकारती दिखाई देती है।
निजी स्टॉक यार्डों की बाढ़, वैधता पर सवाल
ईचागढ़ थाना क्षेत्र में तीन दर्जन से अधिक बालू स्टॉक यार्ड हैं, जिनमें लाखों-लाख सीएफटी बालू का भंडारण किया गया है। यह बालू भारी संख्या में हाइवा ट्रकों द्वारा आसपास के बाजार – जमशेदपुर, रांची आदि स्थानों तक पहुंचाया जा रहा है। सवाल यह उठता है कि इतनी भारी मात्रा में बालू आया कहां से?
यद्यपि यह कहा जाता है कि निजी एजेंसियां बंगाल अथवा JSMDC से बालू खरीदती हैं और उसी के आधार पर चालान प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन अधिकांश स्टॉक यार्ड स्वर्णरेखा नदी के तट पर ही स्थित हैं, और उनके पास तक ट्रैक्टर – वाहन सीधे नदी से पहुंचते देखे गए हैं। इससे संदेह होता है कि बालू की आपूर्ति वास्तव में घाट से नहीं बल्कि सीधे नदी से अवैध खनन द्वारा हो रही है।
प्रशासन और JSMDC की भूमिका संदिग्ध
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, बालू घाटों से रात के अंधेरे में अवैध खनन कर स्टॉक यार्ड तक बालू पहुंचाया जाता है, जहां बाद में फर्जी अथवा पुराने चालानों के सहारे उसे वैध दिखाया जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि यह सब प्रशासन की आंखों के सामने हो रहा है, और कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आती।
JSMDC की भूमिका भी इस पूरे मामले में सवालों के घेरे में है। यदि सारी व्यवस्था उसी के नियंत्रण में है, तो फिर इतने बड़े पैमाने पर अवैध भंडारण कैसे संभव है? क्या अधिकारियों की मिलीभगत से यह धंधा वर्षों से फल-फूल रहा है?
खनन नीति की उड़ रही धज्जियां
राज्य सरकार की स्पष्ट खनन नीति के बावजूद जमीनी हकीकत इसके ठीक विपरीत है। न तो स्टॉक यार्डों पर नियमित जांच की जाती है, न ही परिवहन चालानों की सघनता से जांच होती है। नतीजा यह है कि वैध- अवैध का फर्क मिट गया है और बालू व्यापार एक ‘सिस्टमेटिक रैकेट’ का रूप ले चुका है।
बालू के अवैध भंडारण का यह खेल न सिर्फ प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट है, बल्कि यह प्रशासनिक और राजनीतिक संरक्षण का भी संकेत देता है। आवश्यकता है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जानी चाहिए और दोषियों पर कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।



