11 साल की उम्र में घर से निकली मीना, 16 साल तक नक्सली संगठन में रही – गिरफ्तारी के बाद परिवार की बदहाली ने खड़े किए कई सवाल
पुरुलिया, 08 अगस्त : गरीबी, अभाव और बेहतर भविष्य की उम्मीद किस तरह किसी मासूम को गलत रास्ते तक पहुंचा सकती है, सरायकेला-खरसावां जिले में गिरफ्तार मीना पहाड़िया की कहानी इसका एक उदाहरण है। परिजनों का आरोप है कि महज 11 वर्ष की उम्र में मीना को सरकारी नौकरी और परिवार को पक्का मकान दिलाने का भरोसा देकर नक्सली संगठन ने अपने प्रभाव में लिया था। घर से निकलने के बाद वह करीब 16 वर्षों तक नक्सली दस्ते के साथ जंगलों में रही। 5 अगस्त को दलमा पहाड़ की तराई में संयुक्त सुरक्षा अभियान के दौरान मीना को सागर सिंह सरदार तथा मदन महतो के साथ हथियार समेत गिरफ्तार किया गया।
मीना पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के बलरामपुर थाना क्षेत्र के बढगोंडा (आमकोचा) गांव की रहने वाली है। वह सुखू पहाड़िया और मोनी पहाड़िया की दूसरी बेटी है।
परिजनों के मुताबिक, पिता की मृत्यु के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई थी। मां जंगल से सूखी लकड़ियां इकट्ठा कर बेचती थीं और इसी से परिवार का गुजारा चलता था। इसी दौरान गांव और आसपास के इलाके में नक्सली गतिविधियां बढ़ीं।
परिवार का कहना है कि नक्सली अक्सर उनके क्षेत्र में आते-जाते थे। शुरुआत में मीना से उनके लिए भोजन तैयार करवाया जाता था। धीरे-धीरे उसे संगठन की विचारधारा और गतिविधियों से जोड़ा गया। परिजनों के आरोप के मुताबिक, बाद में मीना को सरकारी नौकरी और परिवार के लिए पक्का मकान दिलाने का भरोसा दिया गया। इसी प्रलोभन में वह संगठन के साथ चली गई।
उस समय मीना की उम्र सिर्फ 11 वर्ष थी।
घर से निकली तो 16 साल बाद लौटी
मीना की बड़ी बहन के अनुसार, घर से जाने के बाद उसका परिवार से संपर्क लगभग टूट गया। परिजन लंबे समय तक उसके लौटने की उम्मीद करते रहे, लेकिन वह वापस नहीं आई।
बाद में परिवार को पता चला कि मीना नक्सली संगठन के साथ जंगल में रह रही है। करीब 16 वर्षों के बाद जब परिजनों ने खबरों में मीना को देखा, तो उनकी अपनी बड़ी बहन को भी पहचानना मुश्किल हो गया।
नौकरी और पक्के मकान का दावा, लेकिन परिवार की हालत नहीं बदली
नक्सली संगठन की ओर से कथित तौर पर नौकरी और पक्के मकान का भरोसा दिए जाने की बात सामने आने के बाद मीना के परिवार की मौजूदा स्थिति कई सवाल खड़े करती है।
परिवार आज भी मिट्टी की दीवार और टीन की छप्पर वाले घर में रहता है। पेयजल के लिए जंगल के झरने पर निर्भरता है। सरकारी स्तर पर लगाया गया सोलर पंप खराब पड़ा है। बरसात में जहरीले जीव-जंतुओं का खतरा बना रहता है।
स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति भी बेहतर नहीं है। परिजनों के अनुसार, गंभीर बीमारी या प्रसव की स्थिति में मरीजों को कई किलोमीटर दूर तक खटिया पर ले जाना पड़ता है।
यानी जिस परिवार को बेहतर भविष्य का सपना दिखाकर मीना को संगठन से जोड़ने का आरोप लगाया जा रहा है, वह परिवार आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है।
11 साल की बच्ची से नक्सली दस्ते तक
मीना का संगठन से जुड़ना महज एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों और युवाओं की संवेदनशील स्थिति से जुड़ा मामला भी है। जिस उम्र में उसके लिए पढ़ाई और भविष्य की नींव तैयार होनी थी, उसी उम्र में वह नक्सली गतिविधियों के प्रभाव में पहुंच गई।
सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, जंगल में संगठन के साथ रहते हुए उसकी मुलाकात सागर सिंह सरदार से हुई। दोनों के बीच संबंध बने और बाद में उन्होंने संगठन के भीतर ही शादी कर ली। दोनों लंबे समय तक एक साथ दस्ते में सक्रिय रहे।
सागर भी 12 साल की उम्र में बना था नक्सली
मीना के साथ गिरफ्तार सागर सिंह सरदार भी नीमडीह थाना क्षेत्र के टेगाडीह पंचायत अंतर्गत बेनाडीह टोला का रहने वाला है। वह रामसिंह सरदार का बड़ा बेटा है।
पुलिस के अनुसार, वर्ष 2008 में करीब 12 वर्ष की उम्र में वह दलमा क्षेत्र के नक्सली कमांडर रहे महावीर खड़िया के संपर्क में आया और संगठन से जुड़ गया। इसके बाद उसने लंबे समय तक नक्सली दस्ते के साथ काम किया।
दोनों की कहानी में एक समानता यह भी है कि उनका नक्सली संगठन तक पहुंचने का सफर किशोरावस्था से पहले ही शुरू हो गया था।
गिरफ्तारी ने खड़े किए बड़े सवाल
5 अगस्त को संयुक्त सुरक्षा अभियान में दोनों की गिरफ्तारी के बाद सुरक्षा एजेंसियां अब उनके संगठनात्मक नेटवर्क और गतिविधियों के संबंध में पूछताछ कर रही हैं।
हालांकि, मीना की कहानी का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अगर परिवार का आरोप सही है कि एक 11 वर्षीय बच्ची को नौकरी और पक्के मकान का लालच देकर संगठन तक पहुंचाया गया, तो यह सवाल भी उठता है कि ऐसे संवेदनशील इलाकों में बच्चों और गरीब परिवारों को नक्सली प्रभाव से बचाने के लिए जमीनी स्तर पर कितनी प्रभावी व्यवस्था मौजूद है।
मीना आज पुलिस की गिरफ्त में है, लेकिन उसके परिवार की जिंदगी अब भी उसी अभाव में है, जिससे निकलने का सपना दिखाकर उसे जंगल की राह पर भेजे जाने का आरोप लगाया जा रहा है।
नक्सल विरोधी अभियान के साथ-साथ इन इलाकों में शिक्षा, रोजगार, सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य और सरकारी योजनाओं की प्रभावी पहुंच सुनिश्चित करना ही उन परिस्थितियों को खत्म करने का स्थायी रास्ता हो सकता है, जिनका फायदा उठाकर नाबालिगों को हिंसा और अपराध के रास्ते पर धकेला जाता है।