बांदना- सोहराय की दस्तक से ग्रामीण बाजारों में लौटी रौनक, कुकड़ू हाट में उमड़ा जनसैलाब

MANBHUM UPDATES
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पशुधन के सम्मान और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व मनाने की तैयारी तेज, मिट्टी के बर्तनों से लेकर गुड़, तेल और पारंपरिक पूजन सामग्री तक की बढ़ी मांग

 

कुकड़ू, 06 नवंबर : झारखंड की समृद्ध आदिवासी एवं ग्रामीण लोकसंस्कृति का प्रतीक बांदना परब और सोहराय अब गांवों की चौपाल से निकलकर बाजारों की रौनक में भी नजर आने लगा है। पर्व की आहट के साथ ही चांडिल अनुमंडल के ग्रामीण इलाकों में उत्साह का माहौल बनने लगा है। शुक्रवार को कुकड़ू के साप्ताहिक हाट में उमड़ी खरीदारों की भीड़ ने बता दिया कि ग्रामीण समाज में परंपराओं का उत्सव शुरू हो चुका है।

सुबह से ही आसपास के गांवों से महिला-पुरुष खरीदारी के लिए कुकड़ू हाट पहुंचने लगे। किसी की पसंद मिट्टी के पारंपरिक बर्तन थे तो कोई गुड़, सरसों तेल और पूजा सामग्री खरीदता नजर आया। बांस से बने सूप, टोकरी, सिंदूर और अन्य पारंपरिक वस्तुओं की दुकानों पर भी अच्छी खासी भीड़ रही। पर्व की तैयारियों को लेकर बाजार में बढ़ी चहल-पहल से स्थानीय दुकानदारों के चेहरे भी खिले रहे।

पांच दिनों तक पशुधन के सम्मान का उत्सव

बांदना और सोहराय महज त्योहार नहीं, बल्कि खेती-किसानी, प्रकृति और पशुधन के साथ ग्रामीण समाज के गहरे रिश्ते को अभिव्यक्त करने वाली लोकपरंपरा है। पांच दिनों तक चलने वाले इस पर्व में गाय-बैलों को नहलाकर, सजाकर और पारंपरिक विधि-विधान से उनकी पूजा की जाती है। कृषि कार्यों में पशुधन के योगदान के प्रति आभार जताने के साथ ग्रामीण प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता भी प्रकट करते हैं।

झामुमो के पूर्व कुकड़ू प्रखंड अध्यक्ष इंद्रजीत महतो ने बताया कि बांदना परब के दौरान गोबरधन पूजा यानी गौहाल पूजा, गाय चुमान और बांदना खूंटा जैसी पारंपरिक रस्में निभाई जाती हैं। ग्रामीण अपने गाय-बैलों को सजाते हैं और पारंपरिक लोकगीतों के माध्यम से उत्सव मनाते हैं। इन रस्मों में पशुधन के प्रति सम्मान और ग्रामीण जीवन में उनके महत्व की झलक मिलती है।

बाजार की खरीदारी में दिख रही संस्कृति की विरासत

खास बात यह है कि पर्व की तैयारियों में आज भी मिट्टी, बांस और प्राकृतिक संसाधनों से बनी पारंपरिक वस्तुओं की अहमियत बनी हुई है। बाजार में इन वस्तुओं की बढ़ती मांग स्थानीय कारीगरों और छोटे दुकानदारों के लिए भी आर्थिक गतिविधियों का अवसर लेकर आई है।

आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के बीच कुकड़ू हाट में उमड़ी भीड़ इस बात की गवाह है कि ग्रामीण समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों से आज भी मजबूती से जुड़ा हुआ है। बांदना और सोहराय के बहाने एक बार फिर गांवों में लोकगीत, परंपराएं और पशुधन के प्रति सम्मान की सदियों पुरानी विरासत जीवंत होने जा रही है।

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