एक माह बाद भी नहीं बदले “लक्ष्मीकांत” के रंग! प्यारेलाल अब भी लापता, लखटकिया परिधान की नई चर्चा

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नीमडीह, 25 जून : ठीक एक माह पहले 25 मई को क्षेत्र में चर्चित “लक्ष्मीकांत बनाम प्यारेलाल” प्रकरण पर एक खबर प्रकाशित हुई थी। उस समय चर्चा थी कि साहब की प्राथमिकता “प्यारेलाल” कम और “लक्ष्मीकांत” ज्यादा हैं। खबर प्रकाशित होने के बाद स्वयं लक्ष्मीकांत ने संपर्क कर भरोसा दिलाया था कि अब वे पूरी तरह “प्यारेलाल” बनने की दिशा में अग्रसर हैं और भविष्य में ऐसी चर्चाओं का अवसर नहीं देंगे।

मगर एक माह बीत गया। कैलेंडर के पन्ने बदल गए, मौसम बदल गया, लेकिन क्षेत्र में चर्चा है कि साहब का प्रशासनिक चरित्र नहीं बदला। लोग अब भी यह जानने को उत्सुक हैं कि आखिर प्यारेलाल महाशय कहां हैं और उनकी वापसी कब होगी।

सप्ताहभर पहले फिर एक नया किस्सा चर्चा में आया। बताया जाता है कि बालू लदे एक वाहन पर कार्रवाई की तलवार तो लटकी, लेकिन बाद में वह वाहन ऐसी सहजता से मुक्त हो गया मानो उसे प्रशासनिक नहीं, आध्यात्मिक मोक्ष प्राप्त हो गया हो। ग्रामीणों के बीच तरह-तरह की कहानियां तैर रही हैं। कोई इसे सम्मान-सत्कार का परिणाम बता रहा है तो कोई इसे महज संयोग मान रहा है। हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

इधर क्षेत्र में अब एक नई चर्चा ने जन्म ले लिया है। इस बार विषय कार्रवाई नहीं, बल्कि परिधान है। गांव-गांव की चौपालों में सवाल उठ रहा है कि आखिर साहब के वस्त्रों का रहस्य क्या है? चर्चाओं के अनुसार लक्ष्मीकांत इन दिनों अत्यंत महंगे और ब्रांडेड परिधानों के शौकीन हो गए हैं। कुछ लोग तो यहां तक दावा कर रहे हैं कि उनके वस्त्रों की कीमत सामान्य सरकारी कर्मचारी के मासिक वेतन को भी चुनौती दे सकती है। हालांकि यह दावा भी चर्चाओं और कयासों तक ही सीमित है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि साहब वास्तव में प्यारेलाल बन चुके हैं तो उन्हें सामने आकर यह बताना चाहिए कि आखिर एक माह में क्या बदलाव हुए। कितनी कार्रवाई नियमसम्मत हुई, कितने मामलों में पारदर्शिता बरती गई और कितने मामलों में जनता का भरोसा मजबूत हुआ।

क्षेत्र में फिलहाल यही चर्चा है कि प्यारेलाल की वापसी की घोषणा तो हुई थी, लेकिन शायद रास्ते में कहीं लक्ष्मीकांत ने उन्हें फिर रोक लिया। नतीजा यह है कि जनता आज भी प्यारेलाल की प्रतीक्षा कर रही है और लक्ष्मीकांत की कहानियां लगातार नई-नई किस्तों में सामने आती जा रही हैं।

अब देखना यह है कि आने वाले दिनों में साहब सचमुच प्यारेलाल बनकर सुशासन का संदेश देते हैं या फिर क्षेत्र की चौपालों में “लक्ष्मीकांत कथा” का अगला अध्याय ही सुनाई देता रहेगा।

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