दिशोम गुरु शिबू सोरेन: एक जीवन, जो संघर्ष और आंदोलन की मिसाल बन गया

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दिशोम गुरु शिबू सोरेन: एक जीवन, जो संघर्ष और आंदोलन की मिसाल बन गया

डेस्क – मानभूम अपडेट्स, 4 अगस्त: 81 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस लेने वाले दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जीवन झारखंड के आदिवासी समाज के लिए एक प्रेरणा की कहानी है। उनका संपूर्ण जीवन संघर्ष, अन्याय के विरुद्ध आंदोलन और सामाजिक बदलाव के लिए समर्पित रहा। वे न केवल एक जननेता थे, बल्कि आदिवासी अस्मिता और अधिकार की आवाज भी थे।

शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को झारखंड के रामगढ़ जिले के बारलंगा थाना अंतर्गत नेमरा गांव में हुआ था। उनके पिता सोबरन मांझी एक सीधे-साधे किसान और शिक्षक थे, जिन्होंने महाजनों- साहूकारों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाई थी। बताया जाता है कि इसी कारण उनकी हत्या कर दी गई। शिबू सोरेन उस समय किशोरावस्था में थे। पिता की हत्या ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने अन्याय के खिलाफ मोर्चा खोलने का संकल्प लिया।

धान कटनी आंदोलन से राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत

पिता की हत्या के बाद शिबू सोरेन ने क्षेत्र में फैले साहूकारों और महाजनों के अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद की। उन्होंने ‘धान कटनी आंदोलन’ की शुरुआत की, जिसमें गांव-गांव जाकर शोषित आदिवासियों को संगठित किया और महाजनों-साहूकारों के द्वारा कब्जाए गए खेतों से धान को काटकर फिर से आदिवासियों को लौटवाया। यह आंदोलन झारखंड के जनसंगठनों की नींव बना।

झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन

सत्तर के दशक में शिबू सोरेन ने अधिवक्ता सह सामाजिक नेता बिनोद बिहारी महतो और वामपंथी विचारधारा के मजदूर नेता एके राय के साथ मिलकर 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की। यह संगठन झारखंड अलग राज्य आंदोलन का प्रमुख आधार बना। शिबू सोरेन इस आंदोलन के सबसे प्रभावशाली और जनाधार वाले नेता बनकर उभरे। उन्होंने वर्षों तक आदिवासी अधिकार, भूमि अधिग्रहण, खनन कंपनियों के शोषण और शिक्षा के सवालों पर संघर्ष किया।

81 वर्ष की उम्र में लंबी बीमारी के बाद दिल्ली में उनका निधन हुआ। उनके निधन से झारखंड ही नहीं, देश की राजनीति में एक युग का अंत हो गया। वे अपने पीछे एक ऐसा आंदोलन छोड़ गए हैं, जिसने लाखों आदिवासियों को आत्मगौरव और अधिकार की भावना दी।

शिबू सोरेन का जीवन केवल एक नेता की जीवनी नहीं, बल्कि यह एक आंदोलन की कहानी है, जिसमें एक बेटे ने पिता की हत्या को अन्याय के खिलाफ संघर्ष का आधार बनाया। दिशोम गुरु आज नहीं हैं, लेकिन उनकी दी हुई चेतना, संघर्ष और आत्मसम्मान की भावना आने वाली पीढ़ियों को राह दिखाती रहेगी।

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