चांडिल : आसनबनी में आदिवासी भूमि और पूजा स्थल पर हमला जारी

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चांडिल : आसनबनी में आदिवासी भूमि और पूजा स्थल पर हमला जारी

ग्रामीणों ने किया भूमाफियाओं का घेराव – पुलिस रही मौन

चांडिल, 18 अगस्त : सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल अंचल के आसनबनी स्थित पारंपरिक जांताल पूजा स्थल और आदिवासी समुदाय की रैयती भूमि पर कब्जे की साजिश लगातार तेज होती जा रही है। रविवार को जेसीबी मशीन से अवैध समतलीकरण करने के बाद सोमवार को भी स्थानीय भूमाफियाओं और जमशेदपुर के बिल्डरों का हौसला बुलंद रहा। इस बार वे भूमि पर चारदीवारी निर्माण के लिए आरसीसी प्लेट और पिलर लाए, साथ ही काफी संख्या में मिस्त्री और मजदूरों को भी जुटा लिया।

ग्रामीणों का प्रतिरोध, हंगामा और चेतावनी

भूमाफियाओं और बिल्डरों की गतिविधि की जानकारी मिलते ही सैकड़ों की संख्या में आसनबनी और आसपास के ग्रामीण इकट्ठा हो गए। उन्होंने कब्जा करने आए लोगों का घेराव किया और जमकर विरोध-हंगामा किया। आक्रोशित ग्रामीणों ने अतिक्रमणकारियों को स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि भूमि कब्जा करने का प्रयास जारी रहा तो उन्हें ग्रामसभा के तहत बांधकर करवाई की जाएगी। ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ जमीन पर हमला नहीं बल्कि उनकी आस्था, संस्कृति और परंपरा पर सीधा आक्रमण है।

पुजारी ने दी पुलिस को शिकायत, थाना ने नहीं लिया संज्ञान

इस बीच पारंपरिक लाया (पुजारी) भूषण पहाड़िया ने चांडिल थाना में लिखित शिकायत किया है। अपने आवेदन में उन्होंने स्पष्ट उल्लेख किया कि आसनबनी पंचायत के दलमा तराई क्षेत्र स्थित जांताल पूजा स्थल – जो कि आदिवासी समाज का पारंपरिक धार्मिक स्थल और सांस्कृतिक धरोहर है – को भूमाफिया और एक व्यक्ति बीएन तिवारी सहित असामाजिक तत्व जबरन कब्जा करने का प्रयास कर रहे हैं।

भूषण पहाड़िया ने आवेदन में खाता संख्या, प्लॉट संख्या और रकवा का पूरा विवरण भी दिया तथा भूमि कब्जा करने वालों के खिलाफ तत्काल प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से चांडिल थाना पुलिस ने न तो आवेदन रिसीव किया और न ही रिसीव कॉपी उपलब्ध कराना जरूरी समझा। इससे स्थानीय लोगों का गुस्सा और बढ़ गया है।

सरकार और प्रशासन पर सवाल

ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन जानबूझकर चुप्पी साधे हुए है और भूमाफियाओं को खुली छूट दे रहा है। उनका कहना है कि यह पूरा खेल सत्ता संरक्षण में चल रहा है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब राज्य के मुख्यमंत्री स्वयं आदिवासी नेता हेमंत सोरेन हैं, तब भी यदि आदिवासी समाज की भूमि और धार्मिक स्थल पर कब्जा हो रहा है, तो यह उनकी साख पर सीधा धब्बा है।

ग्रामीणों ने साफ कहा है कि यदि प्रशासन ने तत्काल कार्रवाई नहीं की, तो यह संघर्ष आंदोलन का रूप लेगा। उनका कहना है कि सरकार अगर चुप रही तो इसे आदिवासी समाज के साथ विश्वासघात माना जाएगा।

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