जमशेदपुर : छोटे वाहन मालिकों की हड़ताल ने थमा दी निर्माण गतिविधियाँ, रोज़ कमाने-खाने वालों की थाली पर संकट

जमशेदपुर, 06 अगस्त : शहर में बालू, गिट्टी, ईंट और सीमेंट की आपूर्ति करने वाले छोटे वाहन मालिकों ने प्रशासनिक कार्रवाई के विरोध में अनिश्चितकालीन हड़ताल का बिगुल फूंक दिया है। इस हड़ताल ने न सिर्फ निर्माण कार्यों को ठप कर दिया है, बल्कि उन हजारों दैनिक मजदूरों की रोज़ी-रोटी पर भी सीधा असर डाला है, जो जमशेदपुर के विभिन्न क्षेत्रों में हर दिन मजदूरी कर अपने घर का चूल्हा जलाते हैं।
छोटे वाहनों के मालिकों का आरोप है कि प्रशासनिक तंत्र द्वारा उनकी गाड़ियों को जब्त किया जा रहा है और उन पर अवैध खनन के आरोप में एफआईआर दर्ज की जा रही है। जबकि वे स्पष्ट करते हैं कि नदी से बालू का कोई अवैध उत्खनन नहीं किया जा रहा है — वे तो लाइसेंस प्राप्त थोक विक्रेताओं से बालू खरीद कर केवल सप्लाई का काम कर रहे हैं।
आज सुबह डिमना चौक पर वाहन मालिकों, चालकों, दैनिक मजदूरों का जमावड़ा लगा था और आगे आंदोलन को तेज करने पर विचार विमर्श हुआ। इस दौरान वाहन मालिकों ने कहा “हमारे छोटे वाहन रोज़गार का जरिया हैं। जब गाड़ी नहीं चलेगी, तो हम क्या खाएंगे? मजदूर क्या खाएंगे?”
हड़ताल का असर केवल सप्लाई तक सीमित नहीं रहा। शहर के विभिन्न हिस्सों में सरकारी और निजी निर्माण कार्य पूरी तरह ठप हो चुके हैं। राजमिस्त्री, बेलदार, लोडर, अनलोडर, ढुलाई करने वाले मजदूर — जिनकी पूरी जिंदगी एक दिन की कमाई पर टिकी होती है — अब खाली हाथ अपने घरों को लौट रहे हैं।
मजदूरों का दर्द समझिए
“साहब, दो दिन से घर में चूल्हा नहीं जला। न काम है, न पैसे। बाल-बच्चे भूखे हैं। प्रशासन और सरकार को हम जैसों की कोई फिक्र नहीं?”
छोटे वाहन मालिकों का कहना है कि खनन विभाग द्वारा उन पर जिन कानूनों के तहत कार्यवाही की जा रही है, वे नियम निर्माण कार्यों में उपयोग होने वाले सामान्य खनिजों — जैसे कि बालू, गिट्टी, मिट्टी — पर लागू ही नहीं होते। उनका आरोप है कि खनन पदाधिकारी जानबूझकर नियमों की गलत व्याख्या करके छोटे व्यापारियों को बाहर करने और बड़े कारोबारियों को एकाधिकार देने की साजिश कर रहे हैं।
विवाद की जड़ – नियमों की गलत व्याख्या?
JMMC Rules, 2004 (संशोधित 2017) और डीलर रूल्स, 2017 की जटिलता को लेकर वाहन मालिकों और प्रशासन के बीच टकराव जारी है। वाहन मालिकों का कहना है कि “विपत्र D” केवल मूल्यवान खनिजों पर लागू होता है, न कि साधारण बालू, मिट्टी और गिट्टी पर। बावजूद इसके, पदाधिकारी उसी नियम के तहत चालान काटते हैं और जबरन जुर्माना वसूलते हैं – वह भी बिना उचित रसीद और कानूनी आधार के।
इस हड़ताल ने प्रशासन की नीतियों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर कर दिया है। जहां एक ओर सरकार ‘हर हाथ को काम’ देने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर ज़मीनी स्तर पर रोज़ कमाने-खाने वालों की आजीविका पर चोट हो रही है।
छोटे वाहन मालिकों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगे नहीं मानी गईं तो वे भूख हड़ताल और बड़ा आंदोलन छेड़ने को मजबूर होंगे।
प्रशासन की चुप्पी और जमीनी सच्चाई के बीच फंसे हैं वे लोग, जो न तो कानून के जानकार हैं, न राजनीति के खिलाड़ी — बस मेहनत से पेट पालने वाले सामान्य नागरिक।
शहर की सड़कें भले खाली हों, लेकिन छोटे वाहनों के पहियों के रुकने से भूख, पीड़ा और बेबसी का भार बढ़ गया है।



