सरकारी जमीन के म्यूटेशन में गड़बड़ी : पूर्व सीओ समेत कई पर गिरेगी गाज
जमशेदपुर/घालभूमगढ़ : कोल्हान प्रमंडल में सरकारी जमीन की हेराफेरी का बड़ा मामला उजागर हुआ है। जमशेदपुर और घालभूमगढ़ अंचल में सरकारी जमीन को गलत तरीके से निजी नाम पर दर्ज (म्यूटेशन) करने का गंभीर मामला सामने आया है। इस गड़बड़ी में तत्कालीन अंचल अधिकारी (सीओ), सीआई और हल्का कर्मचारियों की मिलीभगत पाई गई है। विभागीय जांच के बाद अब इन सभी पर गाज गिरने वाली है।
मामला क्या है?
साल 2017 में एनएच-33 के किनारे करीब 2.14 एकड़ सरकारी बंदोबस्त जमीन का म्यूटेशन एक व्यक्ति रीना नागराज के नाम कर दिया गया था। जबकि यह जमीन सरकारी उपयोग के लिए सुरक्षित थी। जांच में सामने आया कि हल्का कर्मी ने बिना सत्यापन के रिपोर्ट बना दी, सीआई ने उस पर अपनी मुहर लगा दी और तत्कालीन सीओ ने बिना पड़ताल के म्यूटेशन की अनुशंसा कर दी।
जांच में हुआ खुलासा
बाद में जब एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना के लिए इस जमीन का अधिग्रहण होना था, तब गड़बड़ी का खुलासा हुआ। कागजात और अभिलेखों की जांच में पाया गया कि इसमें आम रास्ता, बंदोबस्त और गैरमजरूआ जमीन शामिल है। सरकारी उपयोग वाली जमीन को निजी नाम पर दर्ज करना पूरी तरह अवैध पाया गया।
किन अधिकारियों पर होगी कार्रवाई?
जमशेदपुर अंचल के तत्कालीन सीओ महेश्वर महतो, सीआई और हल्का कर्मचारी को जिम्मेदार पाया गया है। वहीं, घालभूमगढ़ अंचल के तत्कालीन सीओ हरीशचंद्र मुंडा, प्रभारी सीआई जी हाजरा और हल्का कर्मचारी समरेश उरांव पर भी कार्रवाई तय है।
जमशेदपुर के अपर उपायुक्त भगीरथ प्रसाद ने घालभूमगढ़ अंचल के वर्तमान सीओ से विभागीय कार्रवाई का प्रस्ताव मांगा है।
प्रशासन ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। अधिकारियों का मानना है कि सरकारी जमीन के गलत म्यूटेशन से न केवल राजस्व को भारी नुकसान हुआ बल्कि विकास कार्यों और सरकारी योजनाओं में भी बाधा पड़ी। विभागीय जांच पूरी होने के बाद सभी दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
अन्य क्षेत्रों में भी खुल सकते हैं राज
सूत्रों का कहना है कि यदि सरकार गंभीरता से कोल्हान प्रमंडल की अन्य जमीनों की जांच करवाती है तो कई और चौंकाने वाले खुलासे सामने आ सकते हैं। जमशेदपुर शहर से सटे कपाली, डोबो, डिमना, पारडीह, बालीगुमा, गम्हरिया और आदित्यपुर क्षेत्र में पहले से ही अनेक विवादित जमीन मामले चर्चा में रहे हैं। यदि उन मामलों की गहराई से जांच की जाए तो कई और पदाधिकारियों पर कानूनी शिकंजा कसना तय है।
यह पूरा मामला साफ दर्शाता है कि सरकारी जमीन से जुड़े अभिलेखों और म्यूटेशन प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही की कितनी आवश्यकता है। छोटी सी लापरवाही या जानबूझकर मिलीभगत से सरकारी संपत्ति पर निजी कब्जे का रास्ता खुल सकता है, जिसका खामियाजा आम जनता और शासन दोनों को उठाना पड़ता है।