दलमा क्षेत्र में आदिम जनजातियों को उजाड़ने की साजिश के खिलाफ हज़ारों की हुंकार

उपायुक्त कार्यालय, जमशेदपुर के समक्ष आदिवासी संगठनों का ऐतिहासिक प्रदर्शन
जमशेदपुर | दलमा क्षेत्र को “इको-सेंसिटिव ज़ोन” घोषित करने के नाम पर आदिवासी और परंपरागत वननिवासियों को उजाड़ने की साजिश के खिलाफ मंगलवार को उपायुक्त कार्यालय, जमशेदपुर के समक्ष एक ऐतिहासिक जनविरोध प्रदर्शन हुआ। यह विशाल आंदोलन दलमा क्षेत्र ग्राम सभा सुरक्षा मंच (कोल्हान) के नेतृत्व में आयोजित किया गया, जिसमें हजारों ग्रामीणों ने हिस्सा लिया। पटमदा, चांडिल, बोड़ाम, डिमना, घाटशिला, मुसाबनी जैसे कोल्हान के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से हजारों की संख्या में लोग अंबागान मैदान में एकत्र हुए। वहाँ से नारेबाजी करते हुए प्रदर्शनकारी पैदल मार्च करते हुए उपायुक्त कार्यालय पहुंचे।
इस रैली की सबसे बड़ी विशेषता रही महिलाओं की बड़ी भागीदारी। सिर पर परंपरागत गमछा, हाथों में नारे लिखे पोस्टर और बैनर लिए सैकड़ों महिलाएं जब जंगल-जमीन के हक की आवाज़ बुलंद कर रही थीं, तो पूरा माहौल आंदोलित हो गया।वहीं, प्रदर्शकारियों के हाथों में पारंपरिक हथियार लहरा रहे थे। इस दौरान नारे गूंज रहे थे — “हम वनवासी हैं, बेघर नहीं होंगे!” “जंगल हमारा है, कोई नहीं छीन सकता!” “इको-सेंसिटिव जोन की आड़ में विस्थापन नहीं चलेगा!”
प्रदर्शनकारियों ने वन विभाग पर आरोप लगाया कि वह आदिवासियों को उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल करने की योजना के तहत काम कर रहा है।
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि वन अधिकार अधिनियम 2006 (FRA) के तहत आवेदन करने के बावजूद उन्हें व्यक्तिगत वन पट्टा नहीं दिया गया। इसके उलट, वर्षों से बसे लोगों को इधर-उधर दौड़ाया जाता है और उनके हक की जमीन का एक हिस्सा भी नहीं दिया जा रहा।
प्रदर्शन में शामिल एक वक्ता ने कहा “हम इसी जंगल में जन्मे हैं, यही हमारी पहचान है। अब उसी जमीन के लिए सरकार हमसे कागज़ मांग रही है, जो हमारी रगों में बहती है।” यह संघर्ष केवल कागज़ात का नहीं, अस्तित्व और आत्म-सम्मान की लड़ाई है।
प्रदर्शनकारियों ने पूछा — “जब FRA 2006 जैसे कानून मौजूद हैं, तो फिर आदिवासियों को उजाड़ने की यह मुहिम किस संविधान के तहत चल रही है?”
“क्या पर्यावरण की रक्षा लोगों को उनकी जड़ों से काटकर की जाएगी? या यह महज़ कॉर्पोरेट हितों के लिए जंगलों की सफाई का बहाना है?”
प्रदर्शकारियों द्वारा उठाई गई मुख्य मांगे :
इको-सेंसिटिव जोन के नाम पर की जा रही उजाड़ने की कार्रवाई तत्काल रोकी जाए।
प्रत्येक प्रभावित ग्रामसभा की सहमति के बिना कोई निर्णय या कार्रवाई न की जाए।
वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत अधिकारों की वैधानिक प्रक्रिया को पारदर्शिता से पूरा किया जाए।
विस्थापन नहीं, स्थायी परंपरागत अधिकारों की गारंटी सुनिश्चित की जाए।
पूरे मामले की न्यायिक जांच कर दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए।
संगठनों की एकजुटता ने बढ़ाई ताकत
इस जनांदोलन में झारखंड के विभिन्न जनसंगठनों की भागीदारी उल्लेखनीय रही। इनमें शामिल थे — झारखंड ग्राम सभा सुरक्षा मंच, आदिवासी भूमि मुण्डा युवा संगठन, कोल्हान, आदिवासी सम्प्रभुता समिति, चांडिल, सत्यनारायण सोशियो इकनॉमिक एंड रिसर्च सेंटर, झारखंड जनतांत्रिक महासभा, आदिवासी जन मंच, बिरसा सेना, कोल्हान शक्ति पश्चिम सिंहभूम, चाईबासाऔर अन्य संगठनों के सैकड़ों कार्यकर्ता प्रदर्शन में उपस्थित थे।
सामाजिक कार्यकर्ताओं और नेताओं में सुखलाल पहाड़िया, बबिता कच्छप, प्रसुन भील, राधेश्याम सिंह मुण्डा, रविन्द्र सिंह सरदार, डेमका सोय, सत्यनारायण हेम्ब्रम सहित दर्जनों नाम शामिल रहे, जिन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए आंदोलन को तेज करने की बात कही।
इस ऐतिहासिक प्रदर्शन ने साबित किया कि जंगल, जमीन और जीवन से जुड़े मुद्दों पर आदिवासी समाज न केवल जागरूक है, बल्कि सशक्त और संगठित प्रतिरोध के लिए तैयार भी है। यदि सरकार ने इन मांगों की अनदेखी की, तो यह संघर्ष और व्यापक होगा।



