दलमा में विकास नहीं, विस्थापन की साजिश?
ग्राम सभा की सहमति के बिना इको-टूरिज्म परियोजना पर सवाल

जमशेदपुर,विशेष संवाददाता 6 जुलाई : दलमा जंगल में 206 करोड़ की इको-टूरिज्म परियोजना को लेकर राज्य सरकार और वन विभाग भले ही इसे “विकास” का नाम दे रहे हों, लेकिन स्थानीय आदिवासी समुदाय और सामाजिक संगठनों ने इसे “विस्थापन की साजिश” बताया है।
दलमा ग्रामसभा सुरक्षा मंच के संयोजक सुकलाल पहाड़िया ने एक बयान जारी कर कहा कि यह परियोजना PESA कानून और वनाधिकार कानून का खुला उल्लंघन है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब तक ग्राम सभा की लिखित सहमति नहीं ली गई, तब तक किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य कैसे शुरू किया जा सकता है?
सुकलाल पहाड़िया ने कहा कि “दलमा कोई खाली जंगल नहीं है। यह हमारे पूर्वजों की जमीन है, हमारी संस्कृति है, हमारी जीविका है। सरकार गेस्ट हाउस, ट्रैकिंग रूट और वॉच टावर बना रही है, लेकिन यह सब इको-टूरिज्म के नाम पर जंगल पर कब्जा और हमें उजाड़ने की तैयारी है।”
उन्होंने कहा कि इस परियोजना का मकसद स्थानीय आदिवासियों की भागीदारी के बिना बाहरी कंपनियों और पर्यटकों के लिए सुविधा विकसित करना है, जो पारंपरिक अधिकारों को नज़रअंदाज करता है।
सुकलाल पहाड़िया ने तीन प्रमुख मांगें रखीं— ग्राम सभा की बिना सहमति कोई भी परियोजना शुरू न की जाए। वनाधिकार कानून के तहत स्थानीय समुदायों को उनके पारंपरिक अधिकार दिए जाएं। दलमा में कोई भी बदलाव ग्राम सभा की भागीदारी और नेतृत्व में ही हो।
सरकार की चुप्पी पर भी सवाल
विरोध के बावजूद अब तक वन विभाग या राज्य सरकार की ओर से कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण नहीं आया है कि ग्राम सभा की अनुमति ली गई थी या नहीं। इससे यह संदेह और गहराता जा रहा है कि यह परियोजना आदिवासी हितों के खिलाफ हो सकती है।
जंगल हमारी पहचान है, बाज़ार नहीं
दलमा आदिवासी समुदाय के लिए सिर्फ एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान है। ऐसे में इस पर एकतरफा फैसला आदिवासी अधिकारों का हनन माना जा रहा है।
इस पूरे मामले को लेकर आने वाले दिनों में आंदोलन और तेज़ होने की संभावना है। दलमा के ग्रामीणों ने साफ किया है कि वे अपने जंगल, जमीन और अधिकारों को किसी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे।



