हूल दिवस पर भोगनाडीह में बवाल, पुलिस लाठीचार्ज और आंसू गैस से मचा हड़कंप – सांस्कृतिक आयोजन को लेकर आदिवासी संगठनों और प्रशासन के बीच बढ़ा टकराव

भोगनाडीह, साहिबगंज 30 जून संवाददाता विशेष:
झारखंड के ऐतिहासिक गांव भोगनाडीह, जहां 30 जून 1855 को सिदो-कान्हू मुर्मू ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हूल आंदोलन का बिगुल फूंका था, वहां आज एक बार फिर संघर्ष की चिंगारी भड़क उठी। इस बार यह टकराव प्रशासन और आदिवासी संगठनों के बीच हुआ, जिसमें पुलिस को लाठीचार्ज और आंसू गैस का सहारा लेना पड़ा। कई ग्रामीणों और पुलिसकर्मियों के घायल होने की खबर है।
आयोजन की अनुमति रद्द, नाराजगी का विस्फोट
हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी हूल दिवस समारोह को लेकर तैयारियां जोरों पर थीं। सिदो-कान्हू हूल फाउंडेशन और आतु मांझी वैसी संगठन द्वारा भव्य कार्यक्रम की योजना बनाई गई थी, जिसमें पारंपरिक नृत्य, आदिवासी सांस्कृतिक झांकी, शहीद स्मरण और जनसभा शामिल थे।
हालांकि, प्रशासन ने 26 जून को अचानक कार्यक्रम की अनुमति रद्द कर दी, जिसके पीछे प्रशासनिक कारणों और कानून-व्यवस्था का हवाला दिया गया। इस निर्णय से नाराज आदिवासी संगठनों ने विरोध की राह पकड़ ली।
30 जून की सुबह, जब प्रशासनिक टीम स्थल पर पहुंची, तो विरोध उग्र हो गया। घंटों चली नोकझोंक के बाद पुलिस को भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग करना पड़ा।
तनाव बढ़ते देख पुलिस ने लाठीचार्ज किया और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े। इस झड़प में कई ग्रामीण और पुलिसकर्मी घायल हो गए। साहिबगंज उपायुक्त और वरीय पुलिस अधीक्षक घटनास्थल पर पहुंचे और स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, क्रांति की जन्मभूमि
भोगनाडीह वह ऐतिहासिक भूमि है जहाँ सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फुलो-झानो ने 1855 में संथाल हूल आंदोलन शुरू किया था। यह आंदोलन स्वतंत्रता संग्राम का पहला संगठित जन-विद्रोह माना जाता है, जिसने अंग्रेजों की नींव हिला दी थी।
सिदो-कान्हू हूल फाउंडेशन के मंडल मुर्मू ने आरोप लगाया कि प्रशासन आदिवासी समुदाय की अस्मिता और उनकी ऐतिहासिक विरासत के साथ खिलवाड़ कर रहा है। उन्होंने कहा – हमारे पूर्वजों के बलिदान दिवस पर हमें ही कार्यक्रम करने से रोका जा रहा है, यह अन्याय है।
वहीं, प्रशासन का कहना है कि यह कार्यक्रम कई संगठनों द्वारा अलग-अलग रूप से आयोजित किया जा रहा था, जिससे कानून व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो सकती थी। अतः एक ही मंच से संयुक्त आयोजन की अनुमति दी गई थी।
हूल दिवस जैसे ऐतिहासिक और भावनात्मक पर्व को लेकर स्थानीय समुदाय की भावनाओं और प्रशासनिक विवेक के बीच संतुलन साधना नितांत आवश्यक है। आज जो कुछ भोगनाडीह में हुआ, वह इस असंतुलन की परिणति है। भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए संवाद और समन्वय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि संविधान और संस्कृति दोनों की गरिमा बनी रह सके।



