चांडिल छठ घाट हादसा — चेतावनी अनसुनी, जिम्मेदारी किसकी?

चांडिल, 28 अक्टूबर : छठ पर्व की आस्था, अनुशासन और श्रद्धा का पर्व इस बार सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल में शोक में डूब गया। स्वर्णरेखा नदी के शहरबेड़ा घाट पर सोमवार की शाम संध्या अर्घ्य के दौरान जो हादसा हुआ, उसने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया। एक नाबालिग सहित तीन लोगों की डूबने से हुई मौत ने न सिर्फ तीन परिवारों का जीवन उजाड़ दिया, बल्कि सतर्कता और जन-जागरूकता दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दरअसल, प्रशासन ने अपनी ओर से पहले ही चेतावनी जारी कर दी थी। घाट पर अनेकों ‘डेंजर जोन’ के बोर्ड लगाए गए थे, माइकिंग कर लोगों से अपील की गई थी कि वे गहरे पानी में न उतरें। परंतु अफसोस, श्रद्धा और उत्साह के बीच लापरवाही ने ऐसी त्रासदी को जन्म दिया, जिसे रोका जा सकता था। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब प्रशासनिक अपीलों को अनसुना किया जाता है, तो उसकी कीमत किसी की जान बन जाती है।
फिर भी यह कहना गलत नहीं होगा कि सुरक्षा व्यवस्था सिर्फ चेतावनी तक ही सीमित न रहे। स्वर्णरेखा जैसी गहरी और तेज धारा वाली नदी में केवल चेतावनी बोर्ड लगाना पर्याप्त नहीं है। वहां स्थायी सुरक्षा तंत्र की जरूरत है — मजबूत बेरिकेडिंग, पर्याप्त संख्या में स्थानीय स्वयंसेवकों की निगरानी और घाटों पर रौशनी एवं सुरक्षा घेराबंदी का इंतजाम आवश्यक है। उम्मीद है भविष्य में इन बातों का ध्यान रखा जाएगा। खासकर शहरबेड़ा छठ घाट, जहां पहले भी कई बार हादसे हो चुके हैं, उसे या तो “असुरक्षित” घोषित कर बंद किया जाए या फिर पूरी तरह “सुरक्षित घाट” में परिवर्तित किया जाए।




