नारायण आईटीआई लुपुंगडीह में बसु और दीक्षित को किया नमन

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नारायण आईटीआई लुपुंगडीह में बसु और दीक्षित को किया नमन

डॉ. जटाशंकर पांडे बोले— “युवा अपने विरासत और विज्ञान दोनों से सीखें”

चांडिल, 30 नवंबर : नारायण आईटीआई लुपुंगडीह में वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु और स्वदेशी चिन्तक राजीव दीक्षित की जयंती श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई गई। संस्थान परिसर में आयोजित इस कार्यक्रम में प्रशिक्षुओं और शिक्षकों ने इन दोनों महान विभूतियों के योगदान को याद किया। समारोह का मुख्य आकर्षण रहा डॉ. जटाशंकर पांडे का प्रेरक उद्बोधन, जिसमें उन्होंने विज्ञान, स्वदेशी विचार और भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व को सरल भाषा में छात्रों के सामने रखा।

डॉ. पांडे ने कहा कि जगदीश चंद्र बसु ने उस दौर में प्रयोग किए, जब वैज्ञानिक अनुसंधान पर पश्चिमी देशों का एकाधिकार माना जाता था। “पौधों में जीवन और संवेदना साबित कर उन्होंने दुनिया को चौंकाया। क्रेस्कोग्राफ जैसे यंत्र का निर्माण और माइक्रोवेव–रेडियो तरंगों पर उनका शोध आधुनिक वायरलेस तकनीक की बुनियाद है,” उन्होंने कहा।

बसु के प्रकृति–सम्मान पर जोर देते हुए उन्होंने जोड़ा कि आज वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय भी उनकी अवधारणाओं की ओर गंभीरता से देख रहा है।

राजीव दीक्षित पर बोलते हुए डॉ. पांडे ने कहा कि वे “स्वदेशी चिंतन के सबसे प्रखर स्वर” थे। उन्होंने कहा कि दीक्षित ने भारतीय उद्योग, आयुर्वेद और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए ऐसा जनांदोलन खड़ा किया, जिसने युवाओं को देश की जड़ों की ओर लौटने की प्रेरणा दी।

“वे केवल उत्कृष्ट वक्ता नहीं, बल्कि गंभीर शोधकर्ता थे। हजारों ग्रंथों और शोधपत्रों का अध्ययन कर उन्होंने भारत को आत्मनिर्भरता का वैकल्पिक मॉडल दिया,” डॉ. पांडे ने कहा।

कार्यक्रम के अंत में उपस्थित प्रशिक्षुओं ने दोनों महान विभूतियों के पदचिन्हों पर चलने और तकनीकी शिक्षा को राष्ट्रहित में उपयोग करने का संकल्प लिया।

समारोह में जयदीप पांडे, शांति राम महतो, प्रकाश महतो, शुभम साहू, देवाशीष मंडल, संजीत महतो, पवन महतो, शशि प्रकाश महतो सहित कई लोग उपस्थित थे।

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