महासप्तमी पर की गई देवी के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की आरधना

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महासप्तमी पर की गई देवी के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की आरधना

चांडिल, 29 सितंबर : शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन महासप्तमी पर देवी दुर्गा के सातवे स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना की गई। देवी के भक्तों ने विधि-विधान से माता की आराधना किया और पूरे परिवर के सुख-शांति और समृद्धि की मंगलकामना किया। चौका में सार्वजनिक श्रीश्री नवदुर्गा पूजा कमेटी के तत्वावधान में आयोजित नवदुर्गा पूजा के लिए स्थापित देवी के नौ रूपों की भव्य व आकर्षक प्रतिमा पर देवी की आराधना करने के लिए सोमवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। सुबह कलश यात्रा के बाद कलश स्थापना करने के उपरांत देवी का पूजन प्रारंभ किया गया। पूजा-अर्चना और चंडीपाठ के समापन के बाद श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण किया गया।

सदैव शुभ फल देने वाली है मां कालरात्रि

मां दुर्गा की सातवीं शक्ति मां कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं। इसी कारण इनका एक नाम ‘शुभंकारी’ भी है। मां कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली हैं। ये ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं। इनकी कृपा से व्यक्ति सर्वथा भय-मुक्त हो जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार राक्षस और देवताओं के बीच युद्ध में रक्तबीज नाम के एक राक्षस ने अपनी शक्ति से सबको भयभीत कर रखा था। उसे वरदान प्राप्त था कि उसके रक्त के एक भी बुद धरती पर गिरने से उसी के समान एक और शक्तिशाली राक्षस उत्पन्न होगा।

मां कालरात्रि ने किया था रक्तबीज का संहार

देवताओं के आहवान पर जब मां दुर्गा ने रक्तबीज को मारना शुरू किया तो उसके रक्त की बूंदों से लाखों राक्षस पैदा हो गए, जिससे युद्ध की स्थिति और अधिक खराब हो गई। तक मां दुर्गा ने अपनी शक्ति से मां कालरात्रि को उत्पन्न किया। उग्र रूप वाली मां कालरात्रि ने रक्तबीज पर प्रहार किया और उसके रक्त की बूंद को धरती में गिरने से पहले ही अपनी मुख में ले ली। इस प्रकार देवी दुर्गा ने कालरात्रि रूप में भयानक शक्तिशाली राक्षक रक्तबीज का संहार कर देवताओं के भय का अंत किया।

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