दलमा तराई क्षेत्र की समस्याओं को लेकर झारखंड मुक्ति वाहिनी की बैठक

चांडिल, 28 सितंबर : चांडिल प्रखंड के माकुलाकोचा में झारखंड मुक्ति वाहिनी की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता चंदन सिंह सरदार ने की। इस मौके पर बासुदेव आदित्यदेव, सत्यनारायण मुर्मू, गुरुचरण कर्मकार, गुरुचरण लोहार, सुखलाल पहाड़िया, बायला हांसदा, सुदामा हेम्ब्रम, बृहस्पति सिंह सरदार समेत कई पदाधिकारी और कार्यकर्ता मौजूद थे।बैठक में दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी क्षेत्र की विभिन्न समस्याओं और मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।

जर्जर सड़कों पर जताई नाराजगी
बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए चंदन सिंह सरदार ने कहा कि दलमा की मुख्य सड़कें—चाकुलिया से माकुलाकोचा और पोड़ाडीह से बांधडीह तक—पूरी तरह बदहाल हो चुकी हैं। यही सड़कें ग्रामीणों की जीवनरेखा हैं, जिनसे वे अनुमंडल कार्यालय, प्रखंड मुख्यालय, न्यायालय, स्कूल-कॉलेज और अस्पताल जाते हैं। हाल के दिनों में डायरिया के प्रकोप के दौरान मरीजों को ले जाने में ग्रामीणों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। वन विभाग द्वारा सड़कों की मरम्मत महज खानापूर्ति के तौर पर की जाती है, जिससे थोड़े ही दिनों में वे फिर खराब हो जाती हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि गर्मियों में जंगलों में आग लगने पर वन विभाग स्थानीय ग्रामीणों से आग बुझाने का काम तो करवाता है, लेकिन उन्हें न तो सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए जाते हैं और न ही मजदूरी का भुगतान समय पर किया जाता है।
सरदार ने कहा कि दलमा क्षेत्र के आदिवासी-मूलवासी लोगों के विकास के लिए धरातल पर कोई काम नहीं हुआ है। कागजों में योजनाएं तो बनती हैं, लेकिन वे लागू नहीं होतीं। इको सेंसेटिव जोन के लोगों को स्वरोजगार से जोड़ने की योजना भी सिर्फ दिखावा साबित हुई है।
33 करोड़ रुपये का हिसाब मांगा
बासुदेव आदित्यदेव ने सवाल उठाया कि 1982–83 में स्वर्णरेखा बहुउद्देश्यीय परियोजना के तहत दलमा तराई क्षेत्र में मुख्य कैनाल निर्माण कार्य के एवज में वन विभाग को 33 करोड़ रुपये दिए गए थे। उस राशि का उपयोग कहां हुआ, इसकी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि दलमा में पर्यटकों से होने वाली राजस्व वसूली की राशि का भी ब्योरा सामने लाना चाहिए।
सत्यनारायण मुर्मू ने कहा कि इको सेंसेटिव जोन घोषित होने के बावजूद दलमा क्षेत्र के लोग झरनों और डांडी का पानी पीने को मजबूर हैं। वन विभाग द्वारा लगाए गए पानी टैंकों की स्थिति ऐसी है कि वे कभी चालू ही नहीं हुए।
बैठक में जंगली हाथियों और अन्य जानवरों द्वारा फसल बर्बाद किए जाने की समस्या पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि किसानों को क्षतिपूर्ति राशि समय पर नहीं मिलती, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है।
अवैध कटाई और खनन का गंभीर आरोप
वक्ताओं ने वन विभाग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से जंगलों में पेड़ों की अवैध कटाई और पत्थर खनन हो रहा है। वहीं, स्थानीय आदिवासियों को जलावन की लकड़ी लाने पर भी प्रताड़ित किया जाता है।
बैठक में तय किया गया कि यदि जल्द ही समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो झारखंड मुक्ति वाहिनी आंदोलनात्मक कदम उठाएगी।



