कोल्हान में चर्च में हेरो पर्व मनाने को लेकर आदिवासी समाज का विरोध, 12 अगस्त को निकालेगा विरोध मार्च

चाईबासा, 10 अगस्त : आदिवासी हो समाज महासभा ने चर्च में हेरो पर्व मनाने के खिलाफ आवाज उठाई है। महासभा के केंद्रीय अध्यक्ष मुकेश बैरवा की अध्यक्षता में रविवार को कोल्हान के दियूरियों का एक अहम बैठक हुआ। बैठक में यह निर्णय लिया गया कि 12 अगस्त को इस विरोध के तहत एक मार्च निकाला जाएगा, जो पोस्ट ऑफिस चौक से उपायुक्त कार्यालय तक जाएगा। इस विरोध का उद्देश्य चर्च में हेरो पर्व मनाने की प्रक्रिया को समाप्त करने और आदिवासी समाज की धार्मिक पहचान की रक्षा करना है।
बैठक में कई वक्ताओं ने अपनी बातें रखते हुए कहा कि हेरो: पर्व आदिवासी समाज की एक परंपरा है, जिसे खुले खेतों में प्राकृतिक देवताओं की पूजा के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व को चर्च के भीतर मनाना न सिर्फ आदिवासी संस्कृति के खिलाफ है, बल्कि यह ईसाई धर्म के मान्यताओं के विपरीत भी है। बालंडिया दियूरी सामू लागूरी ने आरोप लगाया कि यह प्रयास धर्मांतरण की एक नई साजिश का हिस्सा है, जिससे आदिवासी समाज को अपनी धार्मिक पहचान से वंचित किया जा सकता है।
वहीं, तुईबीर दियुरी मैथ्यू देवगम ने कहा कि प्राकृतिक देवताओं के नाम पर पूजा की जाती है, न कि ईसाई पंथ के किसी देवता या संत के नाम पर। उन्होंने यह भी कहा कि चर्च में हेरो: पर्व मनाने की कोई धार्मिक या सांस्कृतिक जड़ नहीं है। उनका आरोप है कि चर्च में इस पर्व को मनाने के पीछे एक राजनीतिक और सांप्रदायिक उद्देश्य छिपा हुआ है, जो आदिवासियों की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने की कोशिश है।
बैठक में यह भी बात सामने आई कि चर्च में हेरो: पूजा के प्रसाद को लेकर ईसाइयों के साथ विवाद भी हुआ है। कई वक्ताओं ने यह सवाल उठाया कि यदि चर्च में हेरो: पर्व मनाया जा सकता है, तो क्या ईसाई धर्म के लोग हिंदू धर्म के त्योहारों को मनाने का अधिकार रखते हैं?

कई वक्ताओं ने एक और गंभीर मुद्दा उठाया, जिसमें कहा गया कि धर्मांतरण के बाद, आदिवासी समाज के लोगों को एसटी आरक्षण से बाहर कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि वे अब अपनी आदिवासी पहचान से दूर हो चुके हैं।
12 अगस्त को होने वाला विरोध मार्च को लेकर आदिवासी समाज के लोग एकजुट हो गए हैं। यह विरोध उनकी संस्कृति, पहचान और धर्म के प्रति उनके अधिकारों की रक्षा के लिए है।
बैठक में कई प्रमुख लोग शामिल थे, जिनमें दियूरी सदस्य, बुद्धिजीवी और ग्रामीण नेता शामिल थे, जिन्होंने इस विरोध को सफलता दिलाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की।




