सबर बस्ती की बदहाली : दो-दो जलमीनार बंद, बरसात में झरने का गंदा पानी पीने को मजबूर आदिम जनजाति

MANBHUM UPDATES
4 Min Read

सबर बस्ती की बदहाली : दो-दो जलमीनार बंद, बरसात में झरने का गंदा पानी पीने को मजबूर आदिम जनजाति

चांडिल, 11 जुलाई : सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल प्रखंड अंतर्गत दलमा के तराई क्षेत्र माकुलाकोचा – सबर बस्ती में रहने वाले आदिम जनजाति के नौ परिवार इन दिनों जीवन और स्वास्थ्य के संकट से जूझ रहे हैं। दो-दो जलमीनार होने के बावजूद लोगों को बरसात में झरने का दूषित पानी पीना पड़ रहा है। इससे डायरिया जैसी महामारी फैलने का खतरा मंडरा रहा है।

बस्ती में जल आपूर्ति के लिए दो जलमीनार लगाए गए हैं—एक पेयजल एवं स्वच्छता विभाग की ओर से और दूसरा वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा कैम्पा योजना के तहत वर्ष 2023-24 में। शुरुआत में इनसे ग्रामीणों को स्वच्छ जल की आपूर्ति होती थी, लेकिन इस वर्ष गर्मी के मौसम में दोनों जलमीनार खराब हो गए। स्थानीय लोगों के अनुसार, संबंधित विभागों को कई बार इसकी जानकारी देने के बावजूद अब तक कोई मरम्मत नहीं की गई।

डायरिया का डर, टूटी शौचालय और साफ-सफाई की भारी कमी

बस्ती के पास स्थित तुलिन गांव में डायरिया फैलने की पुष्टि पहले ही हो चुकी है। वहीं, माकुलाकोचा गांव का यह सबर टोला तुलिन से सटा हुआ है। ऐसे में यहां भी बीमारी फैलने का खतरा गंभीर हो चला है। ग्रामीणों ने बताया कि वे झरने का पानी छानकर पी रहे हैं, लेकिन यह तरीका पर्याप्त नहीं है।

सबर बस्ती में बनाए गए शौचालय भी उपयोग के लायक नहीं बचे हैं—ज्यादातर जर्जर अवस्था में हैं। लोगों में जागरूकता की भी कमी है, जिसके कारण खुले में शौच और साफ-सफाई की कमी से बीमारियों को न्योता मिल रहा है। इससे साफ होता है कि स्वच्छ भारत मिशन की पहुंच अब तक इस आदिम जनजाति बस्ती तक नहीं हो सकी है।

पंचायत प्रतिनिधि ने जताई गंभीरता

इस पूरे मामले पर चिलगु पंचायत की मुखिया करूणा सिंह ने कहा कि उन्हें जलमीनार की खराबी की सूचना मिली है। संबंधित विभाग को जल्द मरम्मत के लिए लिखा जाएगा। इसके अलावा, सबर परिवारों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने को लेकर ठोस पहल की जाएगी ताकि उन्हें झरने के गंदे पानी पर निर्भर न रहना पड़े।

केंद्र सरकार की ‘हर घर नल’ योजना और जमीनी हकीकत

एक ओर केंद्र सरकार ‘हर घर नल से जल’ ‘जल जीवन मिशन’ जैसी योजना के जरिए देश के हर घर तक स्वच्छ जल पहुंचाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य के कुछ हिस्सों में आदिम जनजाति परिवार आज भी साफ पानी के लिए तरस रहे हैं। यह विडंबना सिर्फ एक बस्ती की नहीं, बल्कि व्यवस्था के असफल क्रियान्वयन की तस्वीर है।

माकुलाकोचा सबर बस्ती की स्थिति बेहद चिंताजनक है। समय रहते यदि प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह छोटी सी समस्या बड़ी महामारी में बदल सकती है। जिम्मेदारों की जवाबदेही तय करते हुए तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

Share This Article