“रन फॉर गजराज” या “रन फॉर प्लास्टिक”? — वन विभाग की लापरवाही ने उजागर किया जागरूकता अभियान का खोखलापन
चांडिल, 06 अक्टूबर : दलमा वन्यजीव अभयारण्य में हाथियों के संरक्षण और मानव–वन्यजीव संघर्ष पर जागरूकता फैलाने के नाम पर आयोजित “रन फॉर गजराज” मैराथन अब खुद पर्यावरण प्रदूषण का प्रतीक बन गया है। पांच अक्टूबर को बड़े जोर-शोर से वन विभाग की अगुवाई में आयोजित इस कार्यक्रम में ईचागढ़ की विधायक और जिले के उपायुक्त तक शामिल हुए, लेकिन आयोजन स्थल की तस्वीर अब सवालों के घेरे में है।
कार्यक्रम खत्म हुए 24 घंटे से भी अधिक समय बीत चुके हैं, लेकिन वही मैदान जहां ‘पर्यावरण संरक्षण’ का नारा बुलंद किया गया था, अब प्लास्टिक की बोतलों, पॉलिथिन और डिस्पोज़ेबल ग्लासों से पटा पड़ा है। जगह-जगह बिखरा कचरा यह बताने के लिए काफी है कि जागरूकता का यह उत्सव दरअसल पर्यावरण के साथ एक ‘विरोधाभासपूर्ण खिलवाड़’ था।
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि मैराथन के दौरान भारी मात्रा में इस्तेमाल की गई प्लास्टिक सामग्री का एक बड़ा हिस्सा अब दलमा क्षेत्र की नदियों और नालों में बह चुका है। इससे न सिर्फ जल प्रदूषण बढ़ा है, बल्कि वन्य जीवों के जीवन पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है। ग्रामीणों ने यह भी बताया कि जिन नदियों के पानी से स्थानीय समुदाय अपनी खेती और दैनिक जरूरतें पूरी करता है, वही जलस्रोत अब प्रदूषित हो चुके हैं — और यह सब वन विभाग की ‘जागरूकता मुहिम’ के नाम पर हुआ है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इस पूरे आयोजन में लगाए गए बैनर और पोस्टर भी प्लास्टिक से बने थे। पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने वाले विभाग द्वारा खुद प्लास्टिक सामग्री का प्रयोग करना न केवल हास्यास्पद है, बल्कि दोहरी नीति का स्पष्ट उदाहरण भी है। सवाल यह है कि क्या वन विभाग के पास पर्यावरण-मित्र विकल्पों — जैसे कपड़े या पेपर बैनर — की जानकारी नहीं थी, या फिर यह कार्यक्रम केवल दिखावे और फोटो खिंचवाने का मंच बनकर रह गया?
वन विभाग जिस दलमा क्षेत्र के हाथियों और पर्यावरण संरक्षण की बात करता है, वही विभाग अब ‘प्लास्टिक प्रदूषण का प्रवक्ता’ बन गया है। बिना ग्रामसभा की अनुमति और बिना पर्यावरणीय दिशा-निर्देशों का पालन किए इस प्रकार का आयोजन करना विभाग की संवेदनहीनता को उजागर करता है।
लोगों का कहना है कि अगर वन विभाग वास्तव में “गजराज” और पर्यावरण की रक्षा चाहता, तो उसे पहले खुद अपने घर की सफाई करनी चाहिए थी — न कि ‘हरित संदेश’ के नाम पर प्लास्टिक के ढेर छोड़ जाना चाहिए था।
अब सवाल यह है: क्या “रन फॉर गजराज” आने वाले समय में हाथियों के लिए सबक बनेगा, या फिर यह केवल एक और ‘फोटो-ऑप इवेंट’ साबित होगा?