बारिश से टूटे घरों को फिर खड़ा करने की उम्मीद में बांस-बल्लियां समेटते दिखे जरूरतमंद, मां दुर्गा की विदाई के बाद सामने आई गरीबी की मार्मिक तस्वीर
जमशेदपुर, 22 अक्टूबर : मां दुर्गा की विदाई के साथ विसर्जन घाटों पर ढोल-नगाड़ों की गूंज थम गई, भक्त अपने घर लौट गए और त्योहार की रौनक धीरे-धीरे खत्म होने लगी। लेकिन इसी बीच घाट पर जिंदगी की एक ऐसी कहानी सामने आई, जो उत्सव की चमक से दूर गरीबी के अंधेरे में उम्मीद तलाश रही थी।
विजयादशमी पर प्रतिमा विसर्जन के बाद कुछ जरूरतमंद लोग घाटों पर बिखरे बांस और बल्लियों को समेटते नजर आए। उनके लिए ये महज बांस के टुकड़े नहीं थे, बल्कि टूटे घर को फिर से खड़ा करने और परिवार को छत देने की उम्मीद थे। जिन बांसों ने नौ दिनों तक मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा को सहारा दिया, अब उन्हीं के सहारे किसी गरीब परिवार का आशियाना तैयार होने की आस है।
बताया जा रहा है कि हाल में हुई बारिश ने कई जरूरतमंद परिवारों के घरों को नुकसान पहुंचाया है। कहीं छत टूट गई, तो कहीं घर की संरचना कमजोर हो गई। आर्थिक तंगी के कारण इन परिवारों के सामने मरम्मत कराना भी बड़ी चुनौती बन गया है। नए बांस खरीदने के लिए पैसे नहीं होने के कारण विसर्जन के बाद घाटों पर छोड़ी गई बांस-बल्लियां उनके लिए उम्मीद का नया रास्ता बन गई हैं।
एक ही घाट पर आस्था और अभाव की दो तस्वीरें देखने को मिलीं। एक ओर लोग मां दुर्गा को भावभीनी विदाई देकर लौट रहे थे, तो दूसरी ओर कुछ जरूरतमंद अपने परिवार की जिंदगी संवारने के लिए बांस समेट रहे थे। किसी के लिए विसर्जन समाप्त हो चुका था, तो किसी के लिए उसी के बाद अपने घर को बचाने की जद्दोजहद शुरू हुई थी।
यह दृश्य एक सवाल भी छोड़ जाता है कि क्या त्योहारों की खुशियां तभी पूरी होंगी, जब समाज के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों के जीवन में भी खुशहाली आएगी?
मां दुर्गा की प्रतिमा को सहारा देने वाले बांस अब किसी गरीब की छत और दीवारों का सहारा बनेंगे। जो सामग्री विसर्जन के बाद अनुपयोगी समझकर छोड़ दी जाती है, वही किसी जरूरतमंद परिवार के लिए अनमोल साबित हो रही है।
मां की विदाई हो गई, लेकिन उनके सहारे से किसी गरीब के घर में नई उम्मीद का आगाज होने जा रहा है। यह तस्वीर सिर्फ गरीबी की कहानी नहीं, बल्कि सीमित संसाधनों के बीच जिंदगी को फिर से खड़ा करने के संघर्ष और उम्मीद की भी कहानी है।



