मनसा पूजा को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह, जालिया समुदाय ने की एक दिन पूर्व पूजा

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मनसा पूजा को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह, जालिया समुदाय ने की एक दिन पूर्व पूजा

डेस्क | मानभूम अपडेट्स, 17 अगस्त :

ओड़िशा, बंगाल सहित झारखंड यानी तत्कालीन मानभूम क्षेत्र में मनसा देवी की पूजा का विशेष महत्व है। सर्प देवी मनसा को लोकदेवी के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि मनसा पूजा करने से सर्पदंश का भय दूर होता है और परिवार में सुख-समृद्धि एवं संतान सुख की प्राप्ति होती है।

बंगला सावन माह की संक्रांति तिथि को मनसा पूजा का आयोजन किया जाता है। आज रविवार को बंगला सावन माह की संक्रांति है, जिसको लेकर श्रद्धालु पूजा की तैयारियों में जुट गए हैं। परंपरा के अनुसार संक्रांति की रात्रि में पूजा संपन्न होती है। पूजा से पहले स्थानीय तालाब, नदी या अन्य जलाशयों से कलश में जल भरकर लाया जाता है, जिसे “बारी यात्रा” कहा जाता है। पूजा स्थल पर कलश स्थापना के बाद ही मनसा देवी की आराधना की जाती है।

मनसा पूजा संपन्न होने के उपरांत बलि प्रथा निभाई जाती है। परंपरागत रूप से बकरा, मुर्गा और बत्तख की बलि दी जाती है, हालांकि विशेष रूप से बत्तख की बलि चढ़ाने की परंपरा अधिक प्रचलित है।

जालिया समुदाय की विशेष परंपरा

आमतौर पर सभी समुदाय बंगला सावन संक्रांति की तिथि को ही मनसा पूजा करते हैं, लेकिन जालिया समुदाय (मछुआरा समाज) एक दिन पहले ही पूजा करता है। लोककथाओं के अनुसार जब सबसे पहले जलाशय में मनसा पूजा का कलश (बारी) मिला था, तो उसे जालिया समुदाय के लोगों ने उठाकर अपने घर में स्थापित कर पूजा की थी। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। अगले दिन जालिया समाज उस कलश (बारी) का विसर्जन करता है, जिसके बाद अन्य समुदाय उसे उठाकर अपने घर या मंदिर में पुनः स्थापित करते हैं और मनसा पूजा करते हैं।

मनसा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था और लोकपरंपरा का उत्सव है। इसमें महिलाएं संतान सुख और परिवार की मंगलकामना करती हैं, वहीं ग्रामीण फसल की उर्वरता और सर्पदंश से रक्षा की प्रार्थना करते हैं।

इस प्रकार मनसा पूजा न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी है बल्कि लोकपरंपराओं और सामाजिक समरसता की प्रतीक भी है।

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