दिशोम गुरु शिबू सोरेन के बाद अब और एक बड़े नेता का निधन, दिल्ली के अस्पताल में ली अंतिम सांस

डेस्क, मानभूम अपडेट्स , 5 अगस्त : देश की राजनीति के लिए यह सप्ताह अत्यंत दुःखद और भावुक कर देने वाला बन गया है। सोमवार को झारखंड आंदोलन के पुरोधा और तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रह चुके दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन से जहाँ राज्य शोक में डूबा था, वहीं मंगलवार को एक और वरिष्ठ राजनेता और पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने भी अंतिम सांस ली। दोनों ही नेताओं ने अलग-अलग दौर में देश और समाज को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में हुआ सत्यपाल मलिक का निधन
78 वर्षीय सत्यपाल मलिक का निधन दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में हुआ, जहाँ वे लंबे समय से इलाजरत थे। उनके निधन की पुष्टि उनके आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) के माध्यम से की गई। वे बिहार, गोवा, मेघालय और जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल रह चुके थे, और अनुच्छेद 370 हटने के समय जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक प्रमुख की भूमिका में थे।
अनुच्छेद 370 हटाने के समय राज्यपाल थे
5 अगस्त 2019 को जब जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा हटाकर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया, तब सत्यपाल मलिक वहाँ के राज्यपाल थे। इस ऐतिहासिक और संवेदनशील परिवर्तन के दौरान उन्होंने संवैधानिक जिम्मेदारियों को निभाया और शासन की निरंतरता सुनिश्चित की। कुछ ही समय बाद उनका स्थानांतरण कर दिया गया, परंतु वे हमेशा इस घटनाक्रम के केंद्र में रहे।
शिबू सोरेन का सोमवार को निधन, आज रामगढ़ के नेमरा गांव में अंतिम संस्कार
इससे एक दिन पहले, सोमवार सुबह, झारखंड की आत्मा कहे जाने वाले दिशोम गुरु शिबू सोरेन का दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में निधन हो गया था। वे 81 वर्ष के थे और लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनका अंतिम संस्कार आज उनके पैतृक गांव नेमरा (थाना बरलंगा, जिला रामगढ़) में राजकीय सम्मान के साथ किया जा रहा है। उनके पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन के लिए झारखंड के कोने-कोने से लोग उमड़े हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सहित तमाम नेताओं ने उन्हें अंतिम विदाई दी।
सत्यपाल मलिक का राजनीतिक सफर और बेबाक छवि
सत्यपाल मलिक ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत चौधरी चरण सिंह के लोकदल से की थी। सामाजिक न्याय और किसान हितों के पैरोकार मलिक, बेबाक वक्तव्य और ईमानदार छवि के लिए जाने जाते रहे। जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा, “यह मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है। हमारा राजनीतिक सफर लोकदल से एक साथ शुरू हुआ था। वे सच्चे मायने में जननेता थे।”
राज्यसभा और लोकसभा — दोनों के सदस्य रहे मलिक को कई संवैधानिक पदों पर कार्य करने का अवसर मिला। वे 2017 से 2022 के बीच चार राज्यों के राज्यपाल रहे। किसानों के आंदोलनों और कृषि कानूनों पर उन्होंने खुलकर केंद्र सरकार की आलोचना की थी। कई बार उनके बयान राष्ट्रीय बहस का विषय बने।
अंतिम दर्शन और राष्ट्र का सम्मान
सत्यपाल मलिक के पार्थिव शरीर को बुधवार को दिल्ली स्थित उनके आवास पर अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा, जिसके बाद पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। उनके निधन पर देश के विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने गहरा दुःख प्रकट किया है।
दो युगों का अंत — शिबू सोरेन और सत्यपाल मलिक
देश ने दो दिनों के भीतर दो ऐसे नेताओं को खो दिया, जिन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में लोगों की आवाज़ बनकर काम किया। शिबू सोरेन आदिवासी अस्मिता, हक़ और संघर्ष का चेहरा थे, तो सत्यपाल मलिक प्रशासनिक मर्यादाओं और किसान हितों के प्रखर प्रहरी।
इन दोनों नेताओं के निधन से देश की राजनीति में जो रिक्तता बनी है, उसकी भरपाई निकट भविष्य में संभव नहीं दिखती।


