गुरुजी के निधन से शोक की लहर: चांडिल के ससुराल और चाकुलिया स्थित बहन के घर में पसरा मातम

चांडिल, 04 अगस्त : झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं राज्यसभा सांसद शिबू सोरेन के निधन की खबर से पूरे राज्य में शोक की लहर दौड़ गई है। खासकर चांडिल प्रखंड के कांगलाटाँड़ गांव स्थित उनके ससुराल और दलमा तराई के चाकुलिया में उनकी बहन के घर मातम का माहौल गहराता चला गया है। जैसे ही गुरुजी के निधन की सूचना दोनों जगहों पर पहुंची, वहां हाहाकार मच गया।
शिबू सोरेन, जिन्हें राज्य के लोग ‘गुरुजी’ के नाम से जानते हैं, का पारिवारिक रिश्ता सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल अनुमंडल क्षेत्र से भी रहा है। कांगलाटाँड़ गांव उनके ससुराल पक्ष का है, जहां पर उनकी पत्नी रूपी सोरेन का मायका है। इधर चाकुलिया में उनकी बहन सुखी टुडू का निवास है। दोनों ही स्थानों पर जैसे ही उनके निधन की खबर पहुंची, परिजनों की चीख-पुकार से वातावरण शोकाकुल हो उठा।
भावुक हो उठे परिजन, ग्रामीणों की भी उमड़ी भीड़
कांगलाटाँड़ में गुरुजी के साले, ससुराल पक्ष के अन्य सदस्य और ग्रामीण काफी भावुक हो उठे। वहीं चाकुलिया में भी उनके नजदीकी रिश्तेदार, नाती -नातिन और अन्य परिजन गहरे दुख में डूबे नजर आए। ग्रामीण भी शिबू सोरेन के संघर्षों और उनके योगदान को याद करते हुए नम आंखों में हैं।
“हमारा अभिभावक चला गया” – ससुराल पक्ष की प्रतिक्रिया
गुरुजी के ससुराल पक्ष के लोगों ने बताया कि वे हमेशा अपने रिश्तों को निभाने में अग्रणी रहे। सादा जीवन, ऊंचे विचार और जमीनी संघर्ष ही उनकी पहचान थी। “गुरुजी का जाना सिर्फ एक नेता का नहीं, एक अभिभावक का जाना है,” – यह बात शिबू सोरेन के साले गुरुचरण किस्कू ने कहा।
चाकुलिया में भी पसरा मातम
चाकुलिया में उनकी बहन के घर भी मातम पसरा हुआ है। परिजनों ने बताया कि गुरुजी समय-समय पर उनसे मिलने आया करते थे। उन्होंने परिवार के साथ-साथ गांववालों से भी आत्मीय रिश्ता बनाए रखा था। उनके निधन से सभी स्तब्ध हैं।
प्रशासन और स्थानीय नेताओं ने भी जताया शोक
चांडिल अनुमंडल क्षेत्र के स्थानीय जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और प्रशासनिक अधिकारियों ने शिबू सोरेन के निधन पर गहरा दुख जताया है। उनके परिवार को ढांढस बंधाने का प्रयास किया जा रहा है।
गौरतलब है कि शिबू सोरेन झारखंड आंदोलन के अग्रणी नेता, झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक और आदिवासी समाज के मजबूत स्तंभ थे। उन्होंने न केवल राजनीतिक मोर्चे पर बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई पहचान के संघर्ष में भी अहम भूमिका निभाई थी।
उनके निधन से न सिर्फ झारखंड बल्कि पूरे देश ने एक कर्मठ और जननायक नेता को खो दिया है।



