शिवभक्तों के आस्था का प्रमुख केंद्र है जयदा का प्राचीन कालीन बुढ़ाबाबा शिव मंदिर

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शिवभक्तों के आस्था का प्रमुख केंद्र है जयदा का प्राचीन कालीन बुढ़ाबाबा शिव मंदिर

डेस्क, 13 जुलाई : सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल प्रखंड अंतर्गम जयदा में स्थित प्राचीनकालीन बुढ़ाबाबा शिव मंदिर शिव भक्तों के आस्था का प्रमुख केंद्र है. पवित्र सावन माह में यहां दूर-दराज से बड़ी संख्या में शिव भक्त पहुंचकर अपने आराध्यदेव के दर्शन-पूजन करते हैं. टाटा-रांची राष्ट्रीय राजमार्ग 33 के किनारे स्वर्णरेखा नदी के तट पर हरे-भरे पहाड़ के गोद में अवस्थित है भोलेनाथ. मान्यता है कि यहां भगवान भोलेनाथ भक्तों के श्रद्धापूर्वक मांगी गई मन्नत पूरी करते हैं. जयदा बुढ़ाबाबा मंदिर में झारखंड के कोने-कोने के अलावा पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, छतीसगढ़ और देश-विदेश से शिवभक्त बाबा के दर्शन-पूजन करते पहुंचते हैं. सावन माह में मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है. सोमवारी पर मंदिर के सामने श्रद्धालुओं की लंबी कतार देखने को मिलता है. यहां शिवभक्त भगवान भोलेनाथ पर जलाभिषेक करते है. मंदिर में हर सोमवार को रुद्राभिषेक किया जाता है. मंदिर परिसर में कई प्राचीनतम शिवलिंगों के अलावा भगवान गणेश-कार्तिक, मां पार्वती, बजरंगबली, मां लक्ष्मी, गुरु दत्तात्रेय, नंदी महाराज समेत कई प्राचीनकालीन मूर्ति स्थापित है.

क्या है मंदिर का इतिहास

ग्रामीण बताते हैं कि जयदा का बुढ़ाबाबा शिव मंदिर सदियों पुराना है. इस क्षेत्र के सौकड़ों की संख्या में शिवलिंग स्थापित थे. संभवत: आक्रमण या नदी में बाढ़ आने के कारण मंदिर घ्वस्त हो गए थे. वर्तमान समय में भी मंदिर परिसर में कई प्राचीनतम शिवलिंग देखते को मिलता है. बताजा जाता है कि 18वीं से 19वीं सदी के मध्यकालीन दिनों में केरा महाराज जयदेव सिंह शिकार खेलते हुए स्वर्णरेखा नदी के किनारे जयदा तक पहुंच गए थे. उनपर जयदा बुढ़ाबाबा की कृपा हुई औश्र कुछ दिनों के अंदर उन्हें सपने में भोलेनाथ दर्शन दिए. भगवान भोलेनाथ के सपने में आने और जयदा में उनके होने की जानकारी महाराज ने तत्काल ईचागढ़ के राजा विक्रमादित्य को दी. महाराज जयदेव सिंह से जानकारी मिलने के बाद जयदा में शिवलिंग की खोज करने के बाद ईचागढ़ राजा की देखरेख में मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ. देखते ही देख्ते जयदा में भव्य मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हुआ और भक्त यहां श्रद्धापूर्वक भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करने लगे. इसके बाद कई बार मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया है.

सावन में रहता है विशेष व्यवस्था

वर्ष 1966 में इस पवित्र धाम में ओडिशा से जूना अखाड़ा के महंत ब्रह्मानंद सरस्वती आए. महंत ब्रह्मानंद सरस्वती व स्थानीय ग्रामीणों ने कठोर परिश्रम से मंदिर का विकास करने का प्रयास किया. महंत ब्रह्मानंद सरस्वती वर्ष 2013 में ब्रह्मलीन हुए. इसके बाद मंदिर का बागडोर उनके शिष्य महंत केशवानंद सरस्वती के हाथों में आ गया. महंत केशवानंद सरस्वती ने बताया कि सावन में प्रत्येक सोमवार को यहां खीर, हलुआ आदि का प्रसाद वितरण किया जाता है. सावन के प्रत्येक शनिवार यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. यहां सुवर्णरेखा नदी से जल उठाकर व बूढ़ा बाबा का आशीर्वाद लेकर दलमा शिव मंदिर, देवघर के बाबा धाम, पश्चिम बंगाल के बेड़ादा, लोहरीया आदि जगहों के लिए शिवभक्त पैदल निकलते हैं। प्रत्येक सोमवार को जयदा शिवलिंग में जलाभिषेक करने के लिए दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंते हैं.

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