कोल्हान में शिबू सोरेन की प्रतिमा स्थापना विवाद पर बोले सामाजिक कार्यकर्ता साधु हो, कहा- पहले मिले स्थानीय वीर सपूतों को प्राथमिकता
चाईबासा, 30 जुलाई : झारखंड आंदोलन के प्रणेता एवं दिशोम गुरु पद्मश्री स्वर्गीय शिबू सोरेन की प्रतिमा को कोल्हान क्षेत्र में स्थापित किए जाने को लेकर उठे विवाद के बीच सामाजिक कार्यकर्ता साधु हो ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि किसी भी महान व्यक्तित्व का सम्मान किया जाना स्वागत योग्य है, लेकिन इस तरह के महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले सामाजिक स्तर पर व्यापक संवाद और सहमति बनाना आवश्यक है।
साधु हो ने कहा कि कोल्हान का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। यहां के हो समुदाय ने न अंग्रेजों से, न किसी राजा से और न ही किसी बाहरी शक्ति से समझौता किया। जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए कोल्हान के वीर योद्धाओं ने सदैव संघर्ष किया और अपने प्राणों की आहुति दी। उन्होंने कहा कि कोल विद्रोह तथा सेरेंगसिया जैसे ऐतिहासिक संघर्षों में हो वीरों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ साहस और बलिदान का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक दृष्टि से भी कोल्हान की अपनी समृद्ध विरासत रही है। कोल्हान के भीष्म पितामह कहे जाने वाले बागुन सुम्ब्रुई सहित कई ऐसे महान व्यक्तित्व हैं, जिनकी प्रतिमाएं स्थापित कर नई पीढ़ी को प्रेरित किया जा सकता है।
साधु हो ने कहा कि वर्तमान में जिस राजनीतिक संगठन द्वारा किसी विशेष व्यक्तित्व की प्रतिमा स्थापित करने की पहल की गई है, उसका उद्देश्य स्वागत योग्य है। हालांकि, यदि इस विषय पर पहले सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवियों और स्थानीय लोगों से संवाद स्थापित किया गया होता तो आज इस मुद्दे पर विरोध की स्थिति उत्पन्न नहीं होती।
उन्होंने सुझाव दिया कि चाईबासा, चक्रधरपुर, जगन्नाथपुर सहित कोल्हान के अन्य छोटे-बड़े शहरों और प्रमुख चौक-चौराहों पर सबसे पहले क्षेत्र के वीर सपूतों एवं ऐतिहासिक विभूतियों की प्रतिमाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उनका मानना है कि इससे कोल्हान की ऐतिहासिक विरासत और स्थानीय महापुरुषों के योगदान को उचित सम्मान मिलेगा।