इको-सेंसिटिव ज़ोन के नाम पर आदिवासियों की बेदखली—रामहरि गोप बोले, यह कॉर्पोरेट दलाली और जंगल की लूट है

वन विभाग और सरकार पर आदिवासी विरोधी साजिश का आरोप
जमशेदपुर। दलमा क्षेत्र को जबरन “इको-सेंसिटिव ज़ोन” घोषित करने और वहां के मूलवासी आदिवासियों को उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल करने की सरकारी कार्रवाई के खिलाफ एक बार फिर विरोध के स्वर तेज़ हो गए हैं। आंबेडकराईट पार्टी ऑफ इंडिया के केंद्रीय सदस्य एवं ईचागढ़ विधानसभा के पूर्व प्रत्याशी रामहरि गोप ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि “यह पूरी प्रक्रिया एक सुनियोजित कॉर्पोरेट दलाली है, जो प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट को वैधानिकता देने का प्रयास है।”
रामहरि गोप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वन विभाग और सरकार की मिलीभगत से पर्यावरण संरक्षण की आड़ में जिन परियोजनाओं को लागू किया जा रहा है, वे दरअसल खनन लॉबी, टूरिज्म माफिया और कॉर्पोरेट कंपनियों के हितों की रक्षा कर रही हैं। “क्या पर्यावरण की रक्षा आदिवासियों को उजाड़कर होगी?” – यह सवाल उन्होंने सरकार से सीधे तौर पर किया।
वन विभाग पर लगे गंभीर आरोप
गोप ने आरोप लगाया कि वन विभाग आदिवासियों की ग्राम सभा की सहमति के बगैर जबरन क्षेत्र को ‘इको-सेंसिटिव ज़ोन’ घोषित कर रहा है, जो संविधान की पाँचवीं अनुसूची, वन अधिकार अधिनियम 2006 और ग्राम सभा की स्वायत्तता का खुला उल्लंघन है।
उन्होंने कहा, “बिना ग्राम सभा की अनुमति कोई भी परियोजना न केवल अवैध है, बल्कि यह आदिवासियों के अधिकारों का खुला दमन है। यह कब्जा नहीं, संघर्ष को जन्म देगा।”
जांच और संघर्ष की चेतावनी
रामहरि गोप ने दलमा क्षेत्र में चल रहे तमाम खनन, टूरिज्म प्रोजेक्ट्स और कॉर्पोरेट ठेकों की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उन्होंने दो टूक कहा कि पुनर्वास नहीं, स्थायी स्वामित्व और संवैधानिक संरक्षण चाहिए।
उन्होंने चेताया कि यदि सरकार ने कॉर्पोरेट हितों के साथ खड़े होकर आदिवासी अस्मिता पर हमला जारी रखा, तो जनआंदोलन का रास्ता अपनाया जाएगा।
“दलमा बिकेगा नहीं, लड़ेगा! जंगल हमारा है, कोई ठेकेदार नहीं!” – इस नारे के साथ गोप ने जनता से एकजुट होकर आंदोलन के लिए तैयार रहने की अपील की।
बता दें कि विगत दिनों वन विभाग ने पूर्वी सिंहभूम जिले के बोड़ाम प्रखंड के बांदरजलकोचा के आदिम जनजाति परिवारों को नोटिस भेजा है, जिसमें उनके पक्के मकान को तोड़ने की बात कही गई है। वन विभाग के नोटिस जारी करने के बाद ही आदिवासी समुदाय और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने विरोध शुरू कर दी है।



