चांडिल : वनडीह अब भी विकास से कोसों दूर, सड़कों के लिए तरसता एक हजार आबादी वाला टोला

झारखंड गठन को 24 वर्ष बीते, लेकिन पक्की सड़क नहीं बनी, जिम्मेदारों की घोर उपेक्षा उजागर
चांडिल, संवाददाता,31 जुलाई : झारखंड राज्य के निर्माण को भले ही 24 वर्ष बीत चुके हों, लेकिन चांडिल प्रखंड के रुचाप पंचायत के हिलीमिली गांव अंतर्गत वनडीह टोला अब भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। करीब एक हजार की आबादी वाले इस टोले तक आज तक पक्की सड़क नहीं पहुंची। यह स्थिति न सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की संवेदनहीनता का जीवंत उदाहरण भी है।
वनडीह के लोग आज भी साढ़े तीन किलोमीटर लंबी कच्ची और कीचड़भरी सड़क से आवागमन करने को मजबूर हैं। बरसात के मौसम में यह रास्ता दलदल में तब्दील हो जाता है, जिससे न केवल ग्रामीणों का आना-जाना बाधित होता है बल्कि छात्रों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों की जान जोखिम में पड़ जाती है।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता नीतू सिंह सरदार ने इसे झारखंड राज्य के विकास की विफलता करार देते हुए कहा, “राज्य गठन के 24 साल बाद भी यदि किसी गांव में पक्की सड़क नहीं बनी है, तो यह साफ दर्शाता है कि हमारे प्रतिनिधि और प्रशासनिक तंत्र ने गांवों की सुध नहीं ली।”
उन्होंने बताया कि गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक ले जाना एक गंभीर चुनौती है, कई बार समय पर इलाज न मिलने से जान जाने का खतरा भी बना रहता है।
ग्रामीणों ने बताया कि इस मुद्दे को लेकर विधायक और स्थानीय जिला पार्षद को कई बार ज्ञापन सौंपा गया, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई। यह दर्शाता है कि क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों के लिए यह गांव सिर्फ वोट बैंक है, समस्याएं नहीं।
सवालों के घेरे में जनप्रतिनिधि और प्रशासन
यह स्थिति एक बड़ा सवाल खड़ा करती है — क्या विकास सिर्फ शहरों और हाईवे तक ही सीमित रहेगा?
क्या वनडीह जैसे गांव लोकतंत्र के हाशिए पर धकेले जा चुके हैं? क्या केवल चुनावी मौसम में ही ग्रामीणों की याद आती है नेताओं को?
सरकार भले ही डिजिटल इंडिया और स्मार्ट विलेज की बात करती हो, लेकिन वनडीह जैसे गांव आज भी विकास की बुनियादी धारा से वंचित हैं। सड़क जैसी मूलभूत सुविधा न होना, एक विफल प्रशासनिक व्यवस्था और मौन जनप्रतिनिधित्व की पोल खोलता है।
ग्रामीणों की मांग:
वनडीह के लोग अब सिर्फ आश्वासन नहीं, जमीनी कार्यवाही चाहते हैं। जल्द से जल्द पक्की सड़क का निर्माण किया जाए। बरसात से पहले वैकल्पिक व्यवस्था की जाए। संबंधित जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को जवाबदेह बनाया जाए।
यदि अब भी प्रशासन और जनप्रतिनिधि नहीं जागे, तो ग्रामीण आंदोलन का रास्ता अपनाने पर विवश होंगे।
यह रिपोर्ट सिर्फ वनडीह की नहीं, झारखंड के उस हर गांव की कहानी है, जो आज भी विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर है।



