चांडिल : हारुडीह में 113 वर्ष पुरानी परंपरा – सरस्वती पूजा महोत्सव में उमड़ेगी भक्ति और संस्कृति की गंगा

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कल से पांच दिन तक अनवरत चलेगा सांस्कृतिक कार्यक्रम, तीन राज्यों के कलाकार देंगे प्रस्तुति

चांडिल, 24 जनवरी : सदी से भी अधिक पुरानी आस्था की डोर से बंधा हारूडीह गांव एक बार फिर विद्या की आराध्या मां सरस्वती के दिव्य आशीर्वाद में डूबने को तैयार है। सार्वजनिक सरस्वती पूजा मेला कमिटि, हारूडीह-धातकीडीह द्वारा आयोजित यह महोत्सव न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि क्षेत्रीय संस्कृति और लोक परंपराओं का संगम भी बन गया है।

1911 से अटूट परंपरा, आज भी कायम है वही उत्साह

वर्ष 1911 में स्थापित यह ऐतिहासिक सरस्वती पूजा आज भी उसी भव्यता और धूमधाम के साथ मनाई जा रही है। आठ दिवसीय महोत्सव के तहत 23 जनवरी को प्राचीन सरस्वती मंदिर में माता वीणापानी की पूजा अर्चना से शुरुआत हुई। आज 24 जनवरी को भी विधिवत पूजा अर्चना और प्रसाद वितरण संपन्न हुआ। अब कल यानी 25 जनवरी से महोत्सव अपने चरम पर पहुंच जाएगा।

पांच दिन, पांच रंग – संस्कृति का अद्भुत संगम

कमिटि के सचिव लक्ष्मीकांत महतो उर्फ़ गिडू महतो ने बताया कि 25 जनवरी से 30 जनवरी तक प्रतिदिन अनवरत सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होगा, जिसमें झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के नामचीन कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे।

25 जनवरी (महा सप्तमी) – शाम को पूर्वी सिंहभूम के बांगुड़दा-कमलपुर से वासुदेव महतो की टीम द्वारा बुगी-वुगी नृत्य की धमाकेदार प्रस्तुति होगी। 26 जनवरी (महा अष्टमी) – गणतंत्र दिवस के इस शुभ अवसर पर दिन में आदिवासी पाता नाच का आयोजन होगा। शाम को पश्चिम बंगाल के झाड़ग्राम से उस्ताद विकास महतो एंड टीम झुमर संगीत से समां बांधेंगे। रात्रि में दोहरा आकर्षण – एक ओर ज्योत्सना देवी एवं बिजली देवी द्वारा प्राचीन बाई नृत्य तो दूसरी ओर लिटा गोसाई ओपेरा द्वारा संथाली ड्रामा की मनमोहक प्रस्तुति। 27 जनवरी (महा नवमी) – दिन में झुमर संगीत के बाद रात्रि में प्राचीन छौ नृत्य का भव्य मंचन होगा। पुरुलिया के स्व० गंभीर सिंह मुंडा के सुपुत्र उस्ताद कार्तिक सिंह मुंडा बनाम उस्ताद बिनाधर कुमार द्वारा विशेष छौ नृत्य प्रस्तुति दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देगी। 28 जनवरी (दशमी) – महाआरती के साथ दोपहर में झाड़ग्राम की प्रसिद्ध झुमर शिल्पी तपती महतो अपनी मधुर आवाज से माहौल को संगीतमय बना देंगी।

29 जनवरी (एकादशी) – “लाल माटी लाल धुला” जैसे लोकप्रिय गीतों के लिए विख्यात झुमर गायक दोपहर में प्रस्तुति देंगे। रात्रि में पुरुलिया की विख्यात महिला छौ नृत्य दल – उस्ताद रेखा रानी सबर और उस्ताद सुनीता महतो मानभूम शैली में छौ नृत्य की अद्भुत प्रस्तुति देंगी।

30 जनवरी को लॉटरी लक्की ड्रा के साथ समारोह का समापन होगा। विशेष लॉटरी का लक्की ड्रा किया जाएगा, जो हर साल आगंतुकों के बीच खासा उत्साह का विषय रहता है।

तीन राज्यों से उमड़ेगी भीड़, मेला की तैयारियां पूर्ण

यह महोत्सव अब केवल धार्मिक आयोजन नहीं रह गया है, बल्कि यह झारखंड के कोने-कोने से आने वाले श्रद्धालुओं के अलावा पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल और ओडिशा से भी हजारों लोगों को आकर्षित करता है। मेला स्थल पर सैकड़ों दुकानें सज चुकी हैं। अनेकों प्रकार के झूले और मनोरंजन के साधन लग चुके हैं, जो बच्चों और युवाओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र हैं।

सांस्कृतिक विरासत को संजोने की अनूठी मिसाल

113 वर्षों से निरंतर चली आ रही यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि क्षेत्रीय संस्कृति, लोक कला और सामाजिक समरसता को जीवित रखने की अनूठी मिसाल भी है। यह महोत्सव इस बात का प्रमाण है कि आधुनिकता की दौड़ में भी हमारी परंपराएं उतनी ही प्रासंगिक और जीवंत हैं।

कमिटी के सचिव लक्ष्मीकांत महतो ने सभी ग्रामवासियों, भक्तजनों और कला प्रेमियों से इस पावन महोत्सव में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की अपील की है।

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