जगरनाथ महतो से रामदास सोरेन तक: शिक्षा विभाग की दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना
डेस्क | मानभूम अपडेट्स, 16 अगस्त
झारखंड की राजनीति इस समय गहरे शोक में डूबी हुई है। राज्य के मौजूदा शिक्षा मंत्री और घाटशिला विधायक रामदास सोरेन का असामयिक निधन न केवल झामुमो और उनके समर्थकों के लिए भारी क्षति है, बल्कि पूरे झारखंड के शिक्षा जगत के लिए भी एक अपूरणीय क्षति है।
याद कीजिए, कुछ ही वर्ष पूर्व झामुमो की पिछली सरकार में स्कूली शिक्षा मंत्री रहे टाइगर जगरनाथ महतो भी असमय हम सबको छोड़कर चले गए थे। महतो के निधन ने उस समय पूरे राज्य को स्तब्ध कर दिया था। और अब रामदास सोरेन के निधन ने मानो उस पीड़ा को और गहरा कर दिया है।
महज संयोग या अदृश्य ग्रहण?
राजनीतिक हलकों में अब यह सवाल गूंजने लगा है कि क्या यह सब महज संयोग है या शिक्षा विभाग सचमुच किसी अदृश्य ग्रहण की चपेट में है? लगातार दो शिक्षा मंत्रियों का इस तरह असमय निधन होना सामान्य बात नहीं कही जा सकती। यह एक ऐसी विडंबना है, जिसने राज्य की राजनीतिक दिशा और शिक्षा विभाग की नीतिगत यात्रा दोनों पर गहरा प्रभाव डाला है।
झारखंड की शिक्षा व्यवस्था पहले से ही गंभीर संकटों से जूझ रही है— विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी। मूलभूत सुविधाओं का अभाव। ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में शिक्षा का पिछड़ना।
ऐसे समय में जब विभाग को सशक्त नेतृत्व की सख्त आवश्यकता थी, तब मंत्रियों के असमय निधन ने मानो इस विभाग की नाव को तूफान के बीच अकेला छोड़ दिया है।
यह प्रश्न केवल राजनीति का नहीं, बल्कि समाज का भी है। शिक्षा किसी भी राज्य के भविष्य की नींव होती है। अगर शिक्षा विभाग ही बार-बार आघात झेलेगा तो क्या आने वाली पीढ़ी के सपनों की मजबूती संभव होगी? राज्य की जनता इस दुर्भाग्य को केवल संयोग मान ले, यह इतना सरल नहीं है। बार-बार उठ रहे इन सवालों का जवाब ढूँढ़ना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।
आज सबसे पहले जरूरत है – शिक्षा विभाग को स्थिरता देना। विभाग की नीतियों को व्यक्ति-निर्भरता से मुक्त कर संस्थागत मजबूती देना।शिक्षा को सिर्फ राजनीतिक पदों का दायित्व न मानकर समाज की धुरी मानते हुए प्राथमिकता पर लाना।
रामदास सोरेन और जगरनाथ महतो दोनों ही जननेता थे, जिन्होंने शिक्षा की बेहतरी की बात की थी। उनका असमय निधन शिक्षा विभाग को शोक और सवाल दोनों सौंप गया है।
क्या शिक्षा विभाग पर वाकई ग्रहण है? इसका उत्तर खोजना आसान नहीं। लेकिन इतना तय है कि झारखंड जैसे राज्य में शिक्षा के साथ बार-बार ऐसी विडंबनाएँ होना किसी त्रासदी से कम नहीं। यह घटनाएँ केवल नेताओं का असमय जाना नहीं हैं, बल्कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था की दिशा और दशा पर भी एक गहरा धक्का है।